--अध्याय 3: कर्मयोग | श्लोक 31
संस्कृत श्लोक:
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः।।31।।
हिंदी अनुवाद:
जोमनुष्य श्रद्धा से युक्त होकर तथा दोषरहित होकर, इस मेरे निरंतर (बताए हुए) मत का अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मों से मुक्त हो जाते हैं।
व्याख्या:
इस श्लोक मेंभगवान श्रीकृष्ण उस शुभ परिणाम का वर्णन करते हैं जो उनके द्वारा बताए गए मार्ग का पालन करने से प्राप्त होता है। जो लोग श्रद्धा (गहरे विश्वास) के साथ और अनसूया (दोष न निकालने वाले/निंदा रहित) भाव से, इस निष्काम कर्मयोग के सिद्धांत का निरंतर पालन करते हैं, वे कर्म के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। यहाँ "मुक्त हो जाते हैं" का अर्थ है कि वे कर्म फल के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर होते हैं, भले ही अभी उन्होंने कर्म करना बंद नहीं किया है।--
अध्याय 3: कर्मयोग | श्लोक 32
संस्कृत श्लोक:
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः।।32।।
हिंदी अनुवाद:
किन्तुजो लोग इस (मेरे मत) की निंदा करके इसका अनुसरण नहीं करते, उन सब प्रकार के ज्ञान से विमूढ़ (विचलित) और मूढ़ बुद्धि वाले समझे हुए सभी मनुष्यों को तुम नष्ट हुआ जानो।
व्याख्या:
यह श्लोक पिछलेश्लोक के विपरीत स्थिति को दर्शाता है। भगवान कहते हैं कि जो लोग इस निष्काम कर्म के सिद्धांत में दोष निकालते हैं (अभ्यसूयन्तः यानी आलोचना करने वाले) और इसका पालन नहीं करते, उनका हाल बहुत ही दयनीय है। वे सभी प्रकार के ज्ञान से वंचित रह जाते हैं और उनकी बुद्धि भ्रमित हो जाती है। ऐसे लोग आध्यात्मिक दृष्टि से नष्ट (पतन को प्राप्त) माने जाते हैं, क्योंकि वे अहंकार और अज्ञान के कारण मुक्ति के मार्ग को स्वीकार नहीं कर पाते।
लेखक एवं संकलनकर्ता
डॉ राधेश्याम गुप्ता
दिनांक 26 अक्टूबर 2025