अध्याय 3: कर्मयोग | श्लोक 23
संस्कृत श्लोक:
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।3.23।।
हिंदी अनुवाद:
हेपार्थ! यदि मैं कभी भी कर्मों में लगन से न लगूँ (और सावधानीपूर्वक कर्म न करूँ), तो सभी मनुष्य हर प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करेंगे (और कर्म छोड़ देंगे)।
व्याख्या:
इस श्लोक मेंभगवान श्रीकृष्ण स्वयं के उदाहरण के माध्यम से एक महत्वपूर्ण सिद्धांत समझाते हैं। वे कहते हैं कि यदि वे स्वयं अपने कर्तव्य कर्मों को पूरी लगन और समर्पण के साथ नहीं करेंगे, तो संसार के सभी लोग उनके इसी आलस्य भरे व्यवहार का अनुकरण करने लगेंगे। इससे समाज में अराजकता फैल जाएगी और लोग अपने कर्तव्यों का पालन करना छोड़ देंगे। यह श्लोक एक श्रेष्ठ व्यक्ति की समाज के प्रति विशेष जिम्मेदारी को रेखांकित करता है।
---अध्याय 3: कर्मयोग | श्लोक 24
संस्कृत श्लोक:
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः।।3.24।।
हिंदी अनुवाद:
यदिमैं कर्म न करूँ, तो ये सभी लोक नष्ट हो जाएँ। मैं विभिन्न वर्णों की मिलावट का कर्ता बन जाऊँ और इन सब प्रजाओं (मनुष्यों) का नाश करने का कारण बन जाऊँ।
व्याख्या:
इस श्लोक मेंभगवान श्रीकृष्ण कर्म न करने के गंभीर दुष्परिणामों की ओर संकेत करते हैं। वे बताते हैं कि यदि वे कर्म करना बंद कर दें, तो समस्त लोकों की व्यवस्था चरमरा जाएगी और विनाश की ओर अग्रसर हो जाएगी। इससे समाज में "सङ्कर" यानी वर्णसंकर (सामाजिक व्यवस्था की गड़बड़ी) उत्पन्न होगी, जिससे प्रजा का क्रमशः नाश हो जाएगा। अर्थात, जब शासक या आदर्श पुरुष अपना कर्तव्य छोड़ देते हैं, तो उसका असर पूरी सामाजिक संरचना पर पड़ता है, जिससे अव्यवस्था और पतन होता है।
लेखक एवं संकलन कर्ता
डॉ राधेश्याम गुप्ता
दिनांक 25 अक्टूबर 2025
No comments:
Post a Comment