Sunday, 26 October 2025

श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 3 श्लोक संख्या 27व28


अध्याय 3: कर्मयोग | श्लोक 27

संस्कृत श्लोक:

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।3.27।।

हिंदी अनुवाद:

प्रकृतिके गुणों द्वारा सम्पन्न होने वाले समस्त कर्मों को, अहंकार से मोहित हुआ अज्ञानी व्यक्ति ही 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है।

व्याख्या:

इस श्लोक मेंवास्तविक कर्तृत्व का सिद्धांत समझाया गया है। सारे कactions प्रकृति के तीन गुणों (सत्, रज, तम) की अंत:क्रियाओं के परिणामस्वरूप ही होते हैं। परन्तु, जो व्यक्ति अज्ञानवश अहंकार में लिप्त है, वह स्वयं को ही कर्ता समझ बैठता है। वह यह भूल जाता है कि शरीर, इंद्रियाँ और मन—ये सब प्रकृति के अंग हैं और उनके द्वारा होने वाले कactions वास्तव में प्रकृति के गुणों द्वारा संचालित होते हैं। यह अहंकार ही बंधन का मूल कारण है।

अध्याय 3: कर्मयोग | श्लोक 28

संस्कृत श्लोक:

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।

गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते।।3.28।।

हिंदी अनुवाद:

किन्तु,हे महाबाहो! गुण और कर्मों के विभाग को तत्व से जानने वाला पुरुष, यह जानकर कि 'गुण ही गुणों में व्यवहार कर रहे हैं', (कर्मों में) आसक्त नहीं होता।

व्याख्या:

पिछलेश्लोक में अज्ञानी की मानसिकता बताई गई थी, इस श्लोक में ज्ञानी की स्थिति का वर्णन है। जो व्यक्ति तत्वज्ञानी है, वह गुण (सत्व, रज, तम) और कर्मों के संबंध को भली-भाँति समझता है। उसे ज्ञात हो जाता है कि शरीर और इंद्रियाँ प्रकृति के गुणों से बनी हैं और ये गुण ही अपने-अपने स्वभाव के अनुसार गुणों (विषयों) में ही व्यवहार कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, मन (रजोगुण) ही विषयों (जो स्वयं गुणमय हैं) की ओर भागता है। इस सच्चाई को जान लेने के बाद वह अपने को कर्ता नहीं मानता और कर्मों के प्रति आसक्ति से मुक्त हो जाता है। वह केवल एक साक्षी भाव बनाए रखता है।

लेखक एवं संकलनकर्ता 

डॉ राधेश्याम गुप्ता 

दिनांक 26 अक्टूबर 2025 

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