Sunday, 26 October 2025

श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 3 श्लोक संख्या 22 व 32

अध्याय 3: कर्मयोग | श्लोक 22


संस्कृत श्लोक:

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।

नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।।3.22।।

हिंदी अनुवाद:

हे पार्थ! तीनों लोकों में मेरा कोई भी कर्तव्य नहीं है, न ही मुझे कुछ प्राप्त करने योग्य शेष है। फिर भी मैं कर्मों में लगा रहता हूँ।:

व्याख्या 

· भगवान की दिव्य स्थिति: 

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अपनी सर्वोच्च स्थिति का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उन्हें तीनों लोकों (स्वर्ग, मृत्यु और पाताल) में कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं है। वह पूर्णतः संपन्न और सर्वत्र व्याप्त हैं।

· कर्म का उद्देश्य:

 यदि ईश्वर को कुछ भी प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है, तो वह कर्म क्यों करते हैं? इसका उत्तर वह स्वयं देते हैं - लोकसंग्रह (समाज के मार्गदर्शन) के लिए। वह एक आदर्श प्रस्तुत करना चाहते हैं ताकि सामान्य मनुष्य यह समझ सके कि निष्काम कर्म कैसे किया जाता है।

· शिक्षा:

 भगवान का यह कथन हमें सिखाता है कि कर्म का उद्देश्य सिर्फ व्यक्तिगत लाभ नहीं होना चाहिए। जब तक हम समाज में रहते हैं, हमारा कर्तव्य बनता है कि हम दूसरों के कल्याण के लिए, एक आदर्श स्थापित करने के लिए कर्म करते रहें।--

अध्याय 3: कर्मयोग | श्लोक 23

सस्कृत श्लोक:

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।3.23।।

हिंदी अनुवाद:

हे पार्थ! यदि मैं कभी भी कर्मों में आसक्ति के साथ लगन से न लगूं, तो मेरे मार्ग का अनुसरण करने वाले सभी मनुष्य (मेरे ही) मार्ग का परित्याग कर देंगे।

व्याख्या:

नेतृत्व की गुरुत्तर जिम्मेदारी: 

यह श्लोक पिछले श्लोकों में दिए गए "लोकसंग्रह" के सिद्धांत को और स्पष्ट करता है। भगवान कहते हैं कि यदि वे स्वयं अपने निर्मित कर्तव्य-मार्ग पर दृढ़तापूर्वक न चलें, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।

· अनुकरण का सिद्धांत: 

लोग ईश्वर या एक श्रेष्ठ नेता के आचरण को ही आदर्श मानकर उसका अनुसरण करते हैं। यदि आदर्श स्वयं कर्म करना बंद कर दे, तो अनुयायी भी कर्म छोड़ देंगे। इससे संसार की व्यवस्था नष्ट हो जाएगी।

· संक्षेप में:

इन दोश्लोकों (22 और 23) का सार यह है कि भगवान स्वयं, बिना किसी व्यक्तिगत लाभ की इच्छा के, केवल एक आदर्श प्रस्तुत करने और समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए निरंतर कर्म करते रहते हैं। यदि सर्वोच्च स्वामी होने के बावजूद वे कर्म न करें, तो यह संसार का पतन हो जाएगा। इस प्रकार, ये श्लोक हमें निष्काम कर्मयोग का वास्तविक अर्थ और एक नेता/श्रेष्ठ व्यक्ति की सामाजिक जिम्मेदारी समझाते हैं।

लेखक एवं संकलनकर्ता 

डॉ राधेश्याम गुप्ता 

दिनांक 25 अक्टूबर 2025

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