अध्याय 3: कर्मयोग | श्लोक 29
संस्कृत श्लोक:
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥२९॥
हिंदी अनुवाद:
प्रकृतिके गुणों से मोहग्रस्त होकर मनुष्य गुणों द्वारा किए जाने वाले कर्मों में आसक्त हो जाते हैं। जो पूर्ण तत्व को नहीं जानते, ऐसे मंदबुद्धि जनों को जो पूर्णज्ञानी है, वह (अपने ज्ञान से) विचलित नहीं करे।
व्याख्या:
इस श्लोक मेंदो प्रकार के लोगों का वर्णन है। पहले प्रकार के लोग वे हैं जो प्रकृति के गुणों (सत्, रज, तम) में ही फंसे रहते हैं और गुणों द्वारा संचालित कर्मों में आसक्त हो जाते हैं। ये अज्ञानी और मंदबुद्धि होते हैं। दूसरे प्रकार के लोग वे हैं जो पूर्ण तत्वज्ञानी हैं। श्लोक का मुख्य उपदेश उन्हीं ज्ञानी लोगों के लिए है। भगवान कहते हैं कि एक ज्ञानी व्यक्ति को चाहिए कि वह अज्ञानियों को उनके कर्मों से विचलित न करे। उनकी समझ अभी इतनी विकसित नहीं हुई है कि वे निष्काम कर्म का सिद्धांत समझ सकें, इसलिए उन्हें उनके कर्तव्य कर्म करने देना चाहिए।
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अध्याय 3: कर्मयोग | श्लोक 30
संस्कृत श्लोक:
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥३०॥
हिंदी अनुवाद:
अध्यात्मबुद्धिसे युक्त होकर सभी कर्मों को मुझमें अर्पण करके, आशा रहित तथा ममतारहित होकर, और शोक से मुक्त होकर युद्ध कर।
व्याख्या:
यह श्लोक अर्जुन केलिए भगवान के उपदेश का सार प्रस्तुत करता है। इसमें निष्काम कर्मयोग का संपूर्ण सूत्र निहित है। भगवान अर्जुन से चार बातें कहते हैं:
1. मयि सर्वाणि कर्माणि: सभी कर्मों का फल मुझमें (परमात्मा में) अर्पण कर दो।
2. निराशीः: कर्म के फल की कोई इच्छा (आशा) न रखो।
3. निर्ममः: 'मेरा' यह ममत्व भाव छोड़ दो।
4. विगतज्वरः: सभी प्रकार के मानसिक क्लेश और शोक से मुक्त हो जाओ।
अंत में, इस भावना के साथ भगवान अर्जुन को उसके प्रधान कर्तव्य, यानी युद्ध करने का आदेश देते हैं। यहाँ 'युद्ध' एक प्रतीक भी है, जिसका अर्थ है अपना नैतिक और धर्मयुक्त कर्तव्य पूरी निष्ठा से करना।
लेखक एवं संकलनकर्ता
डॉ राधेश्याम गुप्ता
दिनांक 26 अक्टूबर 2025
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