Sunday, 26 October 2025

श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 3 श्लोक संख्या 25 व 26

अध्याय 3: कर्मयोग | श्लोक 25

संस्कृत श्लोक:

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।

कुर्याद्विद्वांस् तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्।।3.25।।

हिंदी अनुवाद:

हेभारत! जिस प्रकार अज्ञानी व्यक्ति फल की इच्छा से कर्मों में आसक्त होकर कर्म करते हैं, उसी प्रकार ज्ञानी व्यक्ति को लोक-संग्रह (समाज की रक्षा) की इच्छा से कर्म करने चाहिए, (किन्तु) बिना आसक्ति के।

व्याख्या:

इस श्लोक मेंज्ञानी और अज्ञानी व्यक्ति के कर्म करने के ढंग में अंतर स्पष्ट किया गया है। अज्ञानी लोग कर्मों के फल में आसक्ति रखते हुए कार्य करते हैं, जिससे वे बंधन में बंध जाते हैं। इसके विपरीत, ज्ञानी व्यक्ति का उद्देश्य भिन्न होता है। वह समाज का मार्गदर्शन करने और लोक-कल्याण के लिए कर्म करता है, लेकिन उसका मन कर्म के प्रति आसक्ति से मुक्त रहता है। वह केवल कर्तव्य समझकर, फल की चिंता किए बिना कार्य करता है।

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अध्याय 3: कर्मयोग | श्लोक 26

संस्कृत श्लोक:

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।

जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्।।3.26।।

हिंदी अनुवाद:

ज्ञानीपुरुष को चाहिए कि कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम (बुद्धिभेद) उत्पन्न न करे, बल्कि स्वयं योगयुक्त होकर सभी कर्मों को अच्छी प्रकार से करता हुआ, उन (अज्ञानियों) को भी (अपने उदाहरण से) कर्मों में प्रवृत्त करे।

व्याख्या:

यह श्लोक ज्ञानीव्यक्ति की भूमिका और जिम्मेदारी को और स्पष्ट करता है। एक ज्ञानी व्यक्ति को यह नहीं समझाना चाहिए कि कर्म करना ही नहीं चाहिए, क्योंकि अज्ञानी लोग, जो अभी कर्म के महत्व को ही समझते हैं, इससे भ्रमित हो सकते हैं और कर्तव्य पालन भी छोड़ सकते हैं, जबकि उनकी आसक्ति बनी रहेगी। इसके स्थान पर, ज्ञानी व्यक्ति को स्वयं निष्काम भाव से सभी कर्मों का सही ढंग से पालन करना चाहिए। उसका यह आदर्श व्यवहार ही अज्ञानियों के लिए सबसे बड़ा शिक्षण होगा और उन्हें भी धीरे-धीरे निष्काम कर्म की ओर प्रेरित करेगा।

लेखक एवं संकलनकर्ता 

डॉ राधेश्याम गुप्ता 

दिनांक 25 अक्टूबर 2025

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