Friday, 20 June 2025

महर्षि रमन की आंतरिक गुरु पुकार

        When a person reaches a certain Stage and becomes fits for enlightenment The same god whom he was worshiping the same God comes as a guru and leads him on the guru comes only to tell him the god is within yourself,dive within and realise  God guru and self    are the same . 

Ramana maharishi 


         रमण महर्षि का कथन :

जब कोई व्यक्ति एक निश्चित अवस्था तक पहुँच जाता है और आत्मज्ञान के लिए तैयार हो जाता है, तो वही ईश्वर जिसकी वह पूजा कर रहा था, गुरु के रूप में आता है और उसे मार्गदर्शन देता है। गुरु केवल उसे यह बताने आता है कि ईश्वर तुम्हारे भीतर ही है, भीतर डुबकी लगाओ और अनुभव करो कि ईश्वर, गुरु और स्वयं एक ही हैं।

             कथन की व्याख्या 

        रमण महर्षि का यह गहन कथन 

आत्मज्ञान के मार्ग पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव को दर्शाता है। वे बताते हैं कि जब साधक की आध्यात्मिक यात्रा में परिपक्वता आती है और वह सत्य को जानने के लिए आंतरिक रूप से तैयार हो जाता है, तब उसे बाहरी गुरु की आवश्यकता नहीं रहती। जिस ईश्वर को वह बाहर खोज रहा था, वही ईश्वर उसके जीवन में एक मार्गदर्शक (गुरु) के रूप में प्रकट होता है। इस गुरु का कार्य केवल यह दिखाना है कि ईश्वरीय सत्ता कहीं बाहर नहीं, बल्कि स्वयं साधक के हृदय में निवास करती है। यह पहचान ही वास्तविक आत्मज्ञान है, जहाँ उपासक, उपास्य और उपासना का भेद मिट जाता है, और अनुभव होता है कि ईश्वर, गुरु और अपना 'स्व' (आत्मा) एक ही अविभाज्य सत्य हैं। यह आंतरिक बोध ही सर्वोच्च उपलब्धि है।

 आंतरिक गुरु की पुकार: 

    रमण महर्षि का आत्मज्ञान का मार्ग

हम सभी जीवन में किसी न किसी ईश्वर या शक्ति की तलाश करते हैं। मंदिर जाते हैं, प्रार्थना करते हैं, और मानते हैं कि कहीं दूर बैठा कोई परमपिता हमारी सुन रहा है। लेकिन क्या हो अगर आपको बताया जाए कि जिसे आप बाहर खोज रहे हैं, वह आपके सबसे करीब है? यही रमण महर्षि का संदेश है, जो आत्मज्ञान के गूढ़ रहस्य को बड़ी सरलता से उजागर करते हैं।

महर्षि कहते हैं कि जब एक साधक की आध्यात्मिक यात्रा एक निश्चित पड़ाव पर पहुँच जाती है—जब वह बाहरी खोज से थककर आंतरिक सत्य को जानने के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाता है—तो एक अद्भुत घटना घटती है। जिस ईश्वर की वह इतने समय से आराधना कर रहा था, वही ईश्वर उसके जीवन में एक गुरु के रूप में प्रकट होता है। यह गुरु कोई भौतिक व्यक्ति हो सकता है, या यह आंतरिक मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकता है।

लेकिन इस गुरु का उद्देश्य क्या है? वह हमें कोई नया मंत्र देने या किसी जटिल कर्मकांड में फंसाने नहीं आता। उसका एकमात्र कार्य उस शाश्वत सत्य की ओर इशारा करना है जिसे हम भूल चुके हैं: "ईश्वर तुम्हारे भीतर ही है।" गुरु हमें बाहर देखने की बजाय, भीतर डुबकी लगाने, स्वयं के गहनतम स्तरों में उतरने का आह्वान करता है।

और जब हम यह आंतरिक यात्रा करते हैं, जब हम अपने भीतर गहराई से उतरते हैं, तब हमें एक अभूतपूर्व अनुभव होता है। हम महसूस करते हैं कि जिसे हम ईश्वर मानते थे, जिसे गुरु के रूप में अनुभव किया, और जिसे अपना 'स्व' (आत्मा) समझते थे—ये तीनों वास्तव में अलग नहीं हैं। ये एक ही अविभाज्य सत्ता के विभिन्न पहलू हैं। यह अनुभव ही सच्चा आत्मज्ञान है, जहाँ सभी द्वैत समाप्त हो जाते हैं और हम अपनी सच्ची, असीम प्रकृति को पहचान लेते हैं।


संकलन कर्ता एवं लेखक

डॉ राधेश्याम गुप्ता 

दिनांक 19 जून 2025


तो, क्या आप अपने भीतर के गुरु की पुकार सुनने के लिए तैयार हैं? अपनी बाहरी खोज को विराम दें और अपने भीतर डुबकी लगाएँ। सत्य आपके हृदय में ही प्रतीक्षारत है।

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