मृत्यु एक शाश्वत सत्य है, जो जीवन के चक्र का अनिवार्य हिस्सा है। फिर भी, यह मानव मन को भयभीत करती है। इसका कारण है मन का अज्ञान, अनिश्चितता और अहंकार से उत्पन्न लगाव। सनातन दर्शन में मृत्यु को आत्मा की यात्रा का एक पड़ाव माना गया है, न कि अंत। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं: "जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्ये अर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।" (गीता 2.27) अर्थात्, जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मृत्यु के बाद जन्म भी। अतः अपरिहार्य के लिए शोक करना उचित नहीं।
मृत्यु का भय मनुष्य के मन में इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि वह देह को ही आत्मा मान बैठता है। सनातन दर्शन में आत्मा को अजर-अमर बताया गया है: "नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषति मारुतः।" (गीता 2.23) अर्थात्, आत्मा को न शस्त्र काट सकते, न अग्नि जला सकती, न जल गीला कर सकता, न वायु सुखा सकती। यह आत्मा अविनाशी है, फिर भी मनुष्य माया के बंधन में बंधकर देह के नाश से डरता है।
कुकर्मी और भ्रष्टाचारी को मृत्यु का भय अधिक सताता है, क्योंकि उनके कर्मों का बोझ उनकी अंतरात्मा पर लदा होता है। सनातन शास्त्रों में कहा गया है: "यमस्य करुणा नास्ति, धर्मस्य बलमद्भुतम्।" (महाभारत) अर्थात्, यमराज की कोई करुणा नहीं, धर्म का बल अद्भुत है। कुकर्मी अपने पापों के दंड की आशंका से भयभीत रहता है। वह जानता है कि उसके कर्मों का फल उसे भोगना होगा। यजुर्वेद में उल्लेख है: "पापं प्रज्ञां नाशति।" अर्थात्, पाप बुद्धि का नाश करता है। भ्रष्टाचारी का मन अशांत रहता है, क्योंकि वह सत्य से विमुख हो चुका होता है।
वहीं, एक स्वच्छ और दृढ़ व्यक्ति में आत्मसम्मान और निडरता दिखाई देती है। वह मृत्यु को जीवन का सत्य मानकर उसे स्वीकार करता है। उपनिषदों में कहा गया है: "आत्मानं विद्धि।" अर्थात्, अपने आत्मस्वरूप को जानो। जो व्यक्ति आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है, वह मृत्यु से नहीं डरता। वह समझता है कि देह नश्वर है, पर आत्मा शाश्वत। "न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।" (गीता 2.20) अर्थात्, आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है, न कभी नष्ट होती है।
स्वच्छ व्यक्ति की दृढ़ता कड़वी प्रतीत हो सकती है, क्योंकि वह सत्य और धर्म के मार्ग पर चलता है, जो कठिन होता है। सनातन दर्शन में इसे धर्म की कठोरता कहा गया है: "धर्मो रक्षति रक्षितः।" अर्थात्, धर्म की रक्षा करने वाला धर्म द्वारा रक्षित होता है। स्वच्छ व्यक्ति का आत्मसम्मान उसकी आंतरिक शक्ति से आता है, जो उसे मृत्यु के भय से मुक्त करती है। वह अपने कर्मों पर भरोसा करता है और यमराज के समक्ष भी निर्भीक रहता है।
कुकर्मी का भय उसके पापों का परिणाम है, जबकि स्वच्छ व्यक्ति की कड़वाहट सत्य की रक्षा का प्रतीक है। सनातन शास्त्रों में इसे स्पष्ट किया गया है: "सत्यमेव जयति नानृतम्।" (मुण्डक उपनिषद्) अर्थात्, सत्य ही विजयी होता है, असत्य नहीं। स्वच्छ व्यक्ति का जीवन सत्य और धर्म पर आधारित होता है, जो उसे मृत्यु के भय से परे ले जाता है। वह जानता है कि मृत्यु केवल देह का अंत है, आत्मा का नहीं। "विद्या विनयं ददाति।" (नीतिशतक) अर्थात्, विद्या विनम्रता देती है, और विनम्रता ही सच्ची दृढ़ता का आधार है।
इस प्रकार, सनातन दर्शन मृत्यु के भय को दूर करने का मार्ग दिखाता है। कुकर्मी का भय उसके कर्मों का दर्पण है, जबकि स्वच्छ व्यक्ति की दृढ़ता उसकी आत्मिक शक्ति का प्रतीक। "आत्मवत् सर्वं विश्वति।" अर्थात्, जो आत्मा को जान लेता है, वह विश्व को जान लेता है। मृत्यु का भय तभी तक है, जब तक मनुष्य अज्ञान के अंधकार में डूबा है। सत्य और धर्म का प्रकाश इस भय को मिटा देता है।
इसलिए, हे मानव! अपने कर्मों को शुद्ध कर, आत्मा को पहचान, और मृत्यु को एक सत्य के रूप में स्वीकार कर। "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति।" (कठोपनिषद्) अर्थात्, जो इस संसार को भिन्न-भिन्न देखता है, वही मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है। एक स्वच्छ और दृढ़ जीवन ही मृत्यु के भय को जीत सकता है।
लेखक एवं संकलन कर्ता
डॉ राधेश्याम गुप्ता
22 सितंबर 2025
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