(श्लोक 3.8)
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः।।
भावार्थ:
हे अर्जुन! तू अपने नियत (कर्तव्य) कर्म अवश्य कर। क्योंकि कर्म करना अकर्म (कुछ न करना) से श्रेष्ठ है। और यदि तू कर्म न करेगा तो तेरे शरीर की भी यात्रा (जीवन-निर्वाह) नहीं हो सकेगी।
व्याख्या:
मनुष्य का स्वभाव ही कर्मशील है। कर्म न करने से न तो धर्म-साधना होगी और न ही जीवन यापन संभव होगा। इसलिए नियत कर्म को करना ही चाहिए। गीता का उपदेश है कि कर्म से भागना कमजोरी है; कर्म करते हुए आसक्ति का त्याग करना ही श्रेष्ठ साधन है।
(श्लोक 3.9)
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर।।
भावार्थ:
यज्ञ (भगवान के लिए अर्पण) के अलावा किए गए सभी कर्म मनुष्य को कर्म-बन्धन में डालते हैं। इसलिए हे कुन्तीपुत्र! तू आसक्ति रहित होकर केवल परमेश्वर के लिए कर्म कर।
व्याख्या:
भगवान समझाते हैं कि यदि कर्म केवल भोग, स्वार्थ या अहंकारवश किया जाए तो वह बाँध देता है। लेकिन जब वही कर्म यज्ञभाव से (भगवान को समर्पित कर) किया जाता है तो वह बन्धन से मुक्त कर देता है। यही निष्काम कर्मयोग है। इस प्रकार कर्म ही साधन बनकर मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
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निष्कर्ष श्लोक 3.8–3.9:
मनुष्य को अपने नियत कर्म अवश्य करना चाहिए। लेकिन कर्म तभी मुक्तिदायक है जब उसे ईश्वर-अर्पण भाव से, बिना फल की आसक्ति के किया जाए।
लेखक एवंसंकलन कर्ता
डॉ राधेश्याम गुप्ता।
दिनांक 11 सितंबर 2025
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