Tuesday, 30 September 2025

श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 3 श्लोक संख्या 10 व 11

 श्लोक 10 (गीता 3.10)


सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।

अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥


हिंदी भावार्थ :

प्रजापति (ब्रह्माजी) ने आदि सृष्टि के समय मनुष्यों के साथ यज्ञ की भी रचना की और कहा – “तुम इस यज्ञ द्वारा繁व (वृद्धि) पाओ और यह यज्ञ तुम्हारी सभी इच्छित कामनाओं की पूर्ति करने वाला हो।”


व्याख्या :

यहाँ भगवान समझा रहे हैं कि जब ब्रह्मा ने जगत की रचना की, तब उन्होंने साथ में यज्ञ (सहयोग और त्याग की भावना) भी बनाई।


यज्ञ का तात्पर्य केवल अग्निहोत्र नहीं है, बल्कि निस्वार्थ भाव से कर्म करना और दूसरों के लिए त्याग करना है।


मनुष्य जब अपने कर्तव्यों को यज्ञ भावना से करता है तो उसकी उन्नति होती है और उसकी आवश्यकताएँ स्वतः पूर्ण हो जाती हैं।


इस श्लोक से यह शिक्षा मिलती है कि कर्तव्यकर्म और यज्ञ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, और यज्ञ भाव से किया हुआ कर्म ही जीवन को सफल बनाता है।

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श्लोक 11 (गीता 3.11)

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।

परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥


हिंदी भावार्थ :

तुम इस यज्ञ द्वारा देवताओं (प्रकृति की शक्तियों) को संतुष्ट करो, और वे देवता तुम्हें संतुष्ट करेंगे। इस प्रकार परस्पर सहयोग करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त करोगे।


व्याख्या :

यहाँ "देव" का अर्थ केवल इन्द्र, अग्नि आदि देवता ही नहीं, बल्कि प्रकृति की जीवनदायिनी शक्तियाँ हैं – सूर्य, जल, वायु, पृथ्वी आदि।


यदि मनुष्य यज्ञ भावना से अपने कर्म करता है (अर्थात् प्रकृति का दोहन न करके, संतुलन और कृतज्ञता भाव से कार्य करे), तो प्रकृति भी उसे फल देती है।


जब हम जल, वायु, पृथ्वी और अन्य साधनों का सम्मान करेंगे और उनका संरक्षण करेंगे, तभी वे भी हमें भरपूर फल देंगे।


परस्पर सहयोग और संतुलन की यह प्रणाली ही मनुष्य को श्रेय मार्ग (सच्चे कल्याण) की ओर ले जाती है।

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संक्षिप्त (श्लोक 10-11 ):

भगवान बता रहे हैं कि –

1. सृष्टि की रचना यज्ञ (त्याग और सहयोग) की भावना से हुई।

2. मनुष्य यदि यज्ञभाव से कर्म करेगा तो उसकी इच्छाएँ स्वतः पूर्ण होंगी।

3. प्रकृति और मनुष्य एक-दूसरे पर निर्भर हैं।

4. यदि मनुष्य प्रकृति को संतुष्ट करेगा (संसाधनों का संरक्षण, संतुलन और कृतज्ञता), तो प्रकृति भी मनुष्य की आवश्यकताएँ पूरी करेगी।

5. इस परस्पर सहयोग से ही जीवन में परम कल्याण (आध्यात्मिक और भौतिक दोनों) प्राप्त होता है।

लेखक एवं संकलनकर्ता 

डॉ राधेश्याम गुप्ता 

1 अक्टूबर 2025


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