श्लोक 3.4
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति।।
भावार्थ:
मनुष्य केवल कर्मों को न करने से निष्क्रिय (निष्काम) नहीं हो जाता और न ही मात्र कर्म-त्याग करने से सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
व्याख्या:
भगवान यहाँ बताते हैं कि कर्म छोड़ देने से मुक्ति नहीं मिलती। यदि कोई सोचे कि मैं कुछ न करूँ तो पाप से बच जाऊँगा, तो यह गलत है। आत्म-साक्षात्कार कर्म से भागने में नहीं, बल्कि कर्म को परमात्मा को अर्पण कर निष्काम भाव से करने में है।---
श्लोक 3.5
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।
भावार्थ:
कोई भी मनुष्य क्षणभर भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। सब लोग प्रकृति के गुणों (सत्व, रज, तम) से विवश होकर कर्म करने के लिए बाध्य हैं।
व्याख्या:
यहाँ श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि कर्म स्वभावजन्य है। शरीर, मन और इन्द्रियाँ सदा गतिशील हैं। जब तक जीव शरीर धारण करता है, तब तक वह किसी-न-किसी कर्म में संलग्न रहता ही है। अतः कर्म का त्याग असंभव है। बुद्धिमान वही है जो कर्म करते हुए उसे निष्काम बना ले।
सारांश/निष्कर्ष (श्लोक 3.4–3.5):
मनुष्य कर्म से बच नहीं सकता, इसलिए कर्म त्यागने की बजाय उसे निष्काम भाव से करना ही मुक्ति का मार्ग है।
लेखक एवं संकलनकर्ता
डॉ राधेश्याम गुप्ता
दिनांक 7 सितंबर 2025
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