(श्लोक 3.6)
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते।।
भावार्थ:
जो व्यक्ति बाहर से इन्द्रियों को रोककर बैठता है लेकिन मन में इन्द्रिय विषयों का चिंतन करता रहता है, वह अवश्य ही भ्रमित है और उसे मिथ्याचारी (ढोंगी) कहा जाता है।
व्याख्या:
भगवान यहाँ कपट-संन्यास की आलोचना कर रहे हैं। केवल बाहर से कर्म छोड़ देना और भीतर मन में भोग-वासनाओं का चिंतन करते रहना वास्तविक त्याग नहीं है। यह केवल दिखावा है। सच्चा साधक वह है जो मन और इन्द्रियों दोनों पर नियंत्रण रखे।---
(श्लोक 3.7)
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते।।
भावार्थ:
परंतु जो मन से इन्द्रियों को नियंत्रित कर, इन्द्रियों द्वारा आसक्ति रहित होकर कर्म-योग करता है, वही श्रेष्ठ साधक है।
व्याख्या:
यहाँ भगवान ने सच्चे कर्मयोगी का लक्षण बताया। ऐसा योगी इन्द्रियों को मन से वश में करके, बाह्य कर्म करते हुए भी भीतर आसक्ति नहीं रखता। उसका कर्म निष्काम होता है और वही सच्चा योग है।---
✅ निष्कर्ष श्लोक 3.6–3.7
केवल कर्म का दिखावा छोड़ना ढोंग है। सच्चा कर्मयोग वही है जिसमें मन और इन्द्रियाँ संयमित हों और कर्म करते हुए फल की आसक्ति न हो।
लेखक एवं संकलनकर्ता
डॉ राधेश्याम गुप्ता
दिनांक 11 सितंबर 2025
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