अध्याय 3 श्लोक 12 (गीता 3.12)
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥
हिंदी भावार्थ :
यज्ञ से संतुष्ट किए गए देवता तुम्हें इच्छित भोग प्रदान करेंगे। परन्तु जो मनुष्य उन्हें बिना लौटाए भोग का उपभोग करता है, वह वास्तव में चोर है।
व्याख्या :
भगवान यहाँ यह बताते हैं कि जब मनुष्य यज्ञ-भाव से कर्म करता है तो प्रकृति की शक्तियाँ उसे इच्छित फल देती हैं। किन्तु यदि कोई मनुष्य केवल लेता है और कुछ लौटाता नहीं, तो वह चोरी के समान है।
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अध्याय 3 श्लोक 13 (गीता 3.13)
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥
हिंदी भावार्थ :
जो संतजन यज्ञशिष्ट का सेवन करते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो लोग केवल अपने लिए पकाते और उपभोग करते हैं, वे पाप का ही भोग करते हैं।
व्याख्या :
यहाँ भगवान बताते हैं कि जो भोजन या संसाधन यज्ञभाव से ग्रहण किया जाता है, वह पवित्र होता है और मनुष्य को पाप से मुक्त करता है। जबकि जो केवल स्वार्थवश अपने लिए कर्म करता है, वह पाप का भागी बनता है।
लेखक एवं संकलन कर्ता
डॉ राधेश्याम गुप्ता
दिनांक 1अकबर 2025
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