Tuesday, 5 August 2025

श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 2 श्लोक संख्या 25 व 26

 श्लोक 25:

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।

तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥

 अनुवाद: 

यह आत्मा अव्यक्त (अदृश्य), अचिन्त्य (विचार से परे), और अविकारी (अपरिवर्तनीय) कही जाती है। इसलिए, इस आत्मा के स्वरूप को जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।

भावार्थ: 

श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि आत्मा की प्रकृति शरीर से भिन्न है। आत्मा अदृश्य है, क्योंकि यह भौतिक इंद्रियों से परे है। यह अचिन्त्य है, अर्थात् इसे सामान्य बुद्धि से पूरी तरह समझा नहीं जा सकता। साथ ही, यह अविकारी है, यानी यह कभी परिवर्तित या नष्ट नहीं होती। इसलिए, अर्जुन को अपने प्रियजनों (जैसे भीष्म और द्रोण) की मृत्यु के लिए शोक नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनकी आत्मा अमर है और केवल शरीर नष्ट होता है।

व्याख्या:

अव्यक्त: आत्मा सूक्ष्म और इंद्रियातीत है। इसे आँखों से देखा या भौतिक रूप से अनुभव नहीं किया जा सकता।

अचिन्त्य: आत्मा का स्वरूप इतना गहन है कि इसे सामान्य तर्क या बुद्धि से नहीं समझा जा सकता। यह अनंत और ईश्वरीय है।

अविकारी: आत्मा में कोई परिवर्तन नहीं होता—न यह जन्म लेती है, न मरती है, न इसमें विकार (बदलाव) आता है। यह शाश्वत और स्थिर है।

नानुशोचितुमर्हसि: श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि शोक अज्ञान से उत्पन्न होता है। आत्मा के इस शाश्वत स्वरूप को समझने के बाद मृत्यु का भय या शोक अनुचित है। यह श्लोक अर्जुन के युद्ध में हिचकिचाहट को दूर करने के लिए है, क्योंकि वे अपने संबंधियों की मृत्यु के बारे में चिंतित हैं।

आधुनिक संदर्भ: यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन और मृत्यु केवल शरीर के स्तर पर हैं। आत्मा का वास्तविक स्वरूप अमर है, इसलिए हमें क्षणिक सांसारिक बंधनों में नहीं उलझना चाहिए। यह दृष्टिकोण तनाव, दुख, और भय को कम करने में मदद करता है।

श्लोक 26:

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।

तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥

अनुवाद:

 हे महाबाहो (अर्जुन), यदि तुम इस आत्मा को नित्य जन्म लेने वाली और नित्य मरने वाली मानते हो, तब भी तुम्हें इसके लिए शोक नहीं करना चाहिए।

भावार्थ: 

श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि अर्जुन यह मानते हैं कि आत्मा बार-बार जन्म लेती और मरती है (जैसा कि कुछ दर्शन या विश्वासों में माना जाता है), तब भी शोक करना अनुचित है। क्योंकि यदि आत्मा का जन्म और मृत्यु एक चक्र है, तो यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, और इसमें दुख की कोई बात नहीं। आत्मा का यह चक्र शाश्वत है, और इसमें शोक करने का कोई कारण नहीं।

व्याख्या:

वैकल्पिक दृष्टिकोण: यहाँ श्रीकृष्ण एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। श्लोक 25 में उन्होंने आत्मा को अविनाशी और अपरिवर्तनीय बताया, लेकिन श्लोक 26 में वे कहते हैं कि भले ही कोई आत्मा को जन्म-मृत्यु के चक्र में मानता हो (जैसा कि कुछ अन्य दर्शन, जैसे बौद्ध या जैन, सुझाते हैं), तब भी शोक अनुचित है। क्योंकि यह एक प्राकृतिक और अपरिहार्य प्रक्रिया है।

महाबाहो: अर्जुन को "महाबाहो" (महान भुजाओं वाला) कहकर श्रीकृष्ण उनकी शक्ति और योद्धा स्वभाव को याद दिलाते हैं, ताकि वे कमजोरी (शोक) से बाहर आएँ।

शोक न करने का तर्क: यदि आत्मा अमर है (श्लोक 25), तो शोक का कोई कारण नहीं। और यदि आत्मा जन्म-मृत्यु के चक्र में है (श्लोक 26), तब भी यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें दुख मनाना व्यर्थ है। दोनों ही दृष्टिकोणों में शोक अनावश्यक है।

कर्मयोग की नींव: यह श्लोक अर्जुन को कर्मयोग की ओर प्रेरित करता है—अपना कर्तव्य (युद्ध) करो, बिना फल की चिंता या शोक के।

आधुनिक संदर्भ:

 यह श्लोक हमें जीवन की अनिवार्यता (जैसे जन्म, मृत्यु, परिवर्तन) को स्वीकार करने की सीख देता है। चाहे हम आत्मा को अमर मानें या चक्रीय प्रक्रिया में विश्वास करें, दुख और शोक से ऊपर उठकर अपने कर्तव्यों पर ध्यान देना चाहिए। यह हमें मानसिक दृढ़ता और संतुलन सिखाता है।

डॉ राधेश्याम गुप्ता 

6 अगस्त 2025

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