Monday, 4 August 2025

श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 2 श्लोक संख्या 23 व 24

 श्लोक 23:

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥

शब्दार्थ:

न = नहीं

एनम् = इस (आत्मा को)

छिन्दन्ति = काट सकते हैं

शस्त्राणि = शस्त्र (हथियार)

न = नहीं

दहति = जला सकता है

पावकः = अग्नि

न च = और नहीं

क्लेदयन्ति = गीला कर सकती हैं

आपः = जल

न = नहीं

शोषयति = सुखा सकता है

मारुतः = वायु

भावार्थ: 

आत्मा को न तो कोई शस्त्र काट सकता है, न अग्नि जला सकती है, न जल इसे गीला कर सकता है और न ही वायु इसे सुखा सकती है।

व्याख्या:

 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण आत्मा की अविनाशी और अचल प्रकृति को रेखांकित करते हैं। आत्मा भौतिक तत्वों (शस्त्र, अग्नि, जल, वायु) से परे है और इनके द्वारा प्रभावित नहीं होती। यहाँ चार तत्वों का उल्लेख करके श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि आत्मा भौतिक जगत के सभी प्रभावों से मुक्त है। शस्त्र शरीर को काट सकते हैं, अग्नि शरीर को जला सकती है, जल शरीर को गीला कर सकता है और वायु उसे सुखा सकती है, परंतु आत्मा इन सबसे अप्रभावित रहती है। यह श्लोक अर्जुन को यह समझाने के लिए है कि आत्मा का नाश असंभव है, इसलिए युद्ध में मृत्यु की चिंता करना अनावश्यक है। यह आत्मा की शाश्वतता और उसकी दिव्य प्रकृति को दर्शाता है।

श्लोक 24:

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽयमशोष्य एव च।

नित्यः सर्वगतः स्थाणुः अचलोऽयं सनातनः॥

शब्दार्थ:

अच्छेद्यः = जो काटा न जा सके

अयम् = यह (आत्मा)

अदाह्यः = जो जलाया न जा सके

अक्लेद्यः = जो गीला न किया जा सके

अशोष्यः = जो सुखाया न जा सके

एव च = और भी

नित्यः = शाश्वत

सर्वगतः = सर्वत्र व्याप्त

स्थाणुः = अचल, स्थिर

अचलः = अपरिवर्तनीय

सनातनः = अनादि, शाश्वत

भावार्थ: 

यह आत्मा न काटी जा सकती है, न जलाई जा सकती है, न गीली की जा सकती है और न ही सुखाई जा सकती है। यह नित्य (शाश्वत), सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन (अनादि) है।

व्याख्या: 

यह श्लोक पिछले श्लोक (23) के विचार को और विस्तार देता है। यहाँ आत्मा की विशेषताओं को और स्पष्ट करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मा न केवल भौतिक तत्वों से अप्रभावित है, बल्कि वह नित्य (हमेशा विद्यमान), सर्वगत (सर्वत्र व्याप्त), स्थाणु (स्थिर), अचल (अपरिवर्तनीय) और सनातन (अनादि) है। आत्मा का कोई आदि या अंत नहीं है, और यह समय, स्थान या परिस्थितियों से बंधी नहीं है। यह श्लोक आत्मा की सर्वोच्च और दिव्य प्रकृति को स्थापित करता है, जिससे अर्जुन को यह समझाने का प्रयास किया जाता है कि आत्मा का नाश नहीं होता, इसलिए शोक और भय का कोई कारण नहीं है। यह ज्ञान अर्जुन को उनके कर्तव्य (युद्ध) के प्रति निश्चिंत और दृढ़ होने के लिए प्रेरित करता है।

समग्र संदेश:

श्लोक 23 और 24 मिलकर आत्मा की अविनाशी, शाश्वत और अपरिवर्तनीय प्रकृति को दर्शाते हैं। ये श्लोक यह स्पष्ट करते हैं कि आत्मा भौतिक तत्वों और परिवर्तनों से परे है, जो जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त है।

ये श्लोक अर्जुन के मन में युद्ध के प्रति उत्पन्न भय और शोक को दूर करने के लिए हैं। श्रीकृष्ण उन्हें यह समझाते हैं कि आत्मा का कोई विनाश नहीं होता, इसलिए मृत्यु की चिंता छोड़कर अपने धर्म (कर्तव्य) का पालन करना चाहिए।

ये श्लोक सांख्य योग के मूल सिद्धांत को रेखांकित करते हैं, जो आत्मा और शरीर के बीच भेद को स्पष्ट करता है। शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा अमर और अविनाशी है।

आधुनिक संदर्भ में: 

ये श्लोक हमें जीवन के प्रति एक गहन दृष्टिकोण प्रदान करते हैं। आत्मा की अविनाशी प्रकृति को समझने से हम मृत्यु, हानि या परिवर्तन के भय से मुक्त हो सकते हैं। यह हमें जीवन की अनित्यता को स्वीकार करने और अपने कर्तव्यों को निस्स्वार्थ भाव से निभाने की प्रेरणा देता है। यह दर्शन हमें तनाव, चिंता और भौतिक सुख-दुख के बंधनों से मुक्ति की ओर ले जाता है।

लेखक एवं संकलन कर्ता 

डॉ राधेश्याम गुप्ता 

5 अगस्त 2025 

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