Tuesday, 5 August 2025

श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 2 श्लोक संख्या 27 व 28

श्लोक संख्या 27 

तस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।

तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥

 अनुवाद: 

जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मरता है, उसका जन्म निश्चित है। इसलिए, इस अपरिहार्य (जो टाला न जा सके) विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।

भावार्थ: 

श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जन्म और मृत्यु प्रकृति का अटल नियम है। जिसने जन्म लिया, उसकी मृत्यु अवश्य होगी, और जो मर गया, उसका पुनर्जन्म भी निश्चित है। यह एक प्राकृतिक और अपरिहार्य चक्र है। इसलिए, अर्जुन को अपने प्रियजनों (जैसे भीष्म, द्रोण) की मृत्यु के लिए शोक नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है।

व्याख्या:

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः: यहाँ श्रीकृष्ण जीवन की अनिवार्यता पर जोर देते हैं। जन्म और मृत्यु एक सिक्के के दो पहलू हैं। जो भी जन्म लेता है, उसे मरना ही है। यह प्रकृति का नियम है, जिसे कोई बदल नहीं सकता।

ध्रुवं जन्म मृतस्य च: मृत्यु के बाद पुनर्जन्म भी उतना ही निश्चित है। यह हिंदू दर्शन के कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत से जुड़ा है, जिसमें आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरे में प्रवेश करती है।

अपरिहार्येऽर्थे: यह चक्र अपरिहार्य (inevitable) है। इसे टाला नहीं जा सकता। इसलिए, इसमें शोक करना व्यर्थ है।

न त्वं शोचितुमर्हसि: श्रीकृष्ण अर्जुन को उनके कर्तव्य (युद्ध) की ओर प्रेरित करते हैं, यह समझाते हुए कि मृत्यु और जन्म को स्वीकार करके उन्हें अपने धर्म का पालन करना चाहिए।

संदेश: यह श्लोक जीवन की नश्वरता को स्वीकार करने और शोक से मुक्त होकर कर्तव्य पर ध्यान देने की सीख देता है। यह अर्जुन को युद्ध के लिए मानसिक रूप से तैयार करता है, ताकि वे भावनात्मक कमजोरी से ऊपर उठें।

आधुनिक संदर्भ: यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन में परिवर्तन (जैसे जन्म, मृत्यु, या अन्य नुकसान) अपरिहार्य हैं। हमें इनके लिए शोक करने के बजाय जीवन के उद्देश्य और कर्तव्यों पर ध्यान देना चाहिए। उदाहरण के लिए, स्वचालन या आर्थिक बदलाव जैसे मुद्दों में डरने के बजाय, हमें अनुकूलन (adaptation) और नए अवसरों की तलाश करनी चाहिए।

श्लोक 28:

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।

अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥

 अनुवाद: 

हे भारत (अर्जुन), सभी प्राणी जन्म से पहले अव्यक्त (अदृश्य) हैं, मध्य में व्यक्त (दृश्य) हैं, और मृत्यु के बाद फिर अव्यक्त हो जाते हैं। इसमें शोक करने की क्या बात है?

भावार्थ: 

श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि सभी प्राणियों का अस्तित्व जन्म से पहले और मृत्यु के बाद अव्यक्त (अदृश्य) होता है, और केवल जीवन के मध्य में वे व्यक्त (दृश्य, भौतिक रूप में) होते हैं। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें शोक करने का कोई कारण नहीं। आत्मा का स्वरूप शाश्वत है, और शरीर केवल एक अस्थायी आवरण है।

व्याख्या:

अव्यक्तादीनि भूतानि: जन्म से पहले प्राणी अव्यक्त हैं, यानी उनका भौतिक रूप नहीं होता। आत्मा सूक्ष्म और इंद्रियातीत होती है।

व्यक्तमध्यानि: जीवन के दौरान प्राणी भौतिक शरीर के रूप में दृश्यमान होते हैं। यह शरीर आत्मा का अस्थायी आवरण है।

अव्यक्तनिधनान्येव: मृत्यु के बाद शरीर नष्ट हो जाता है, और आत्मा फिर से अव्यक्त हो जाती है, या तो मुक्ति पाती है या नए शरीर में प्रवेश करती है।

तत्र का परिदेवना: इस प्राकृतिक चक्र में शोक (परिदेवना) करने का कोई अर्थ नहीं। श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि शरीर का नष्ट होना और आत्मा का अव्यक्त होना स्वाभाविक है, इसलिए युद्ध में मृत्यु को लेकर चिंता अनुचित है।

कर्मयोग का आधार: यह श्लोक अर्जुन को उनके योद्धा धर्म की याद दिलाता है। वे अपने कर्तव्य (युद्ध) पर ध्यान दें, न कि मृत्यु के परिणामों पर।

दर्शन: यह श्लोक हिंदू दर्शन के आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता के सिद्धांत को और मजबूत करता है। यह श्लोक 25 की अव्यक्त-अचिन्त्य-अविकारी अवधारणा को और विस्तार देता है।

आधुनिक संदर्भ: 

यह श्लोक हमें जीवन की अनित्यता (impermanence) को स्वीकार करने की प्रेरणा देता है। उदाहरण के लिए, स्वचालन या नौकरी छिनने जैसे बदलावों को हम मृत्यु-जन्म के चक्र की तरह देख सकते हैं—पुराने अवसर खत्म होते हैं, नए अवसर जन्म लेते हैं। इसके बजाय कि हम डरें या शोक करें, हमें नए कौशल और अवसरों की तलाश करनी चाहिए।

लेखक एवं संकलन कर्ता 

डॉ राधेश्याम गुप्ता 

6 अगस्त 2025

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