Monday, 4 August 2025

श्रीमद्गभगवत गीता अध्याय 2 श्लोक 21 व 22

 श्लोक 21:

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।

कथं स पुरुषः पार्थ कं घातति हन्ति कम्॥

शब्दार्थ:

वेद = जो जानता है

अविनाशिनम् = अविनाशी

नित्यम् = शाश्वत, सदा रहने वाला

यः = जो

एनम् = इस (आत्मा को)

अजम् = अजन्मा, जन्मरहित

अव्ययम् = अविनाशी, न बदलने वाला

कथम् = कैसे

सः पुरुषः = वह व्यक्ति

पार्थ = हे अर्जुन

कम् = किसे

घातति = मारता है

हन्ति = नष्ट करता है

भावार्थ: 

हे अर्जुन! जो व्यक्ति आत्मा को अविनाशी, नित्य, जन्मरहित और अव्यय (न बदलने वाला) जानता है, वह कैसे किसी को मार सकता है या किसी के द्वारा मारा जा सकता है?

व्याख्या: 

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मा की अमरता का ज्ञान दे रहे हैं। आत्मा न तो जन्म लेती है, न मरती है, न ही उसे कोई मार सकता है। यह शाश्वत और अविनाशी है। जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है, वह यह जान पड़ता है कि शरीर का नाश होने पर भी आत्मा का कोई नाश नहीं होता। इसलिए, युद्ध में मृत्यु या वध की चिंता करना व्यर्थ है। यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को उनके कर्तव्य (युद्ध) की ओर प्रेरित करते हुए भय और शोक से मुक्त होने का उपदेश दे रहे हैं।

श्लोक 22:

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥

शब्दार्थ:

वासांसि = वस्त्र

जीर्णानि = पुराने, जीर्ण-शीर्ण

यथा = जैसे

विहाय = त्याग कर

नवानि = नए

गृह्णाति = ग्रहण करता है

नरः = मनुष्य

अपराणि = अन्य

तथा = वैसे ही

शरीराणि = शरीर

विहाय = छोड़कर

जीर्णानि = पुराने

अन्यानि = अन्य

संयाति = प्राप्त करता है

नवानि = नए

देही = देहधारी (आत्मा)

भावार्थ: 

जैसे मनुष्य पुराने, जीर्ण-शीर्ण वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने, जीर्ण शरीर को छोड़कर नए शरीर को प्राप्त करती है।

व्याख्या:

 इस श्लोक में श्रीकृष्ण आत्मा की निरंतरता और शरीर की अस्थायी प्रकृति को एक सरल उपमा के माध्यम से समझाते हैं। जैसे कोई व्यक्ति पुराने कपड़ों को उतारकर नए कपड़े पहन लेता है, वैसे ही आत्मा मृत्यु के समय पुराने शरीर को छोड़कर कर्मों के अनुसार नया शरीर धारण करती है। यहाँ आत्मा को देही (शरीर धारण करने वाला) कहा गया है, जो शरीर से भिन्न और अविनाशी है। इस उपमा के द्वारा श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाने का प्रयास करते हैं कि मृत्यु केवल शरीर की होती है, आत्मा की नहीं। इसलिए, मृत्यु का भय छोड़कर अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।

समग्र संदेश:

श्लोक 21 आत्मा की अविनाशी और शाश्वत प्रकृति पर जोर देता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आत्मा को कोई मार नहीं सकता और न ही वह किसी को मारती है। यह अर्जुन के युद्ध के प्रति भय और संदेह को दूर करने का प्रयास है।

श्लोक 22 आत्मा के शरीर परिवर्तन को एक स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में दर्शाता है, जो जन्म-मृत्यु के चक्र को समझने में सहायता करता है। यह उपमा जीवन और मृत्यु के प्रति वैराग्य और निस्संगता की भावना उत्पन्न करती है।

दोनों श्लोक मिलकर अर्जुन को यह सिखाते हैं कि आत्मा का सत्य समझकर शोक, भय और मोह को त्यागकर अपने धर्म (कर्तव्य) का पालन करना चाहिए।

आधुनिक संदर्भ में:

 ्ये श्लोक हमें जीवन के प्रति एक गहरी दार्शनिक दृष्टि प्रदान करते हैं। यह समझ कि हमारा सच्चा स्वरूप आत्मा है, जो अजर-अमर है, हमें सांसारिक सुख-दुख, हानि-लाभ और जन्म-मृत्यु के प्रति उदासीन बनने की प्रेरणा देता है। यह हमें अपने कर्तव्यों का निर्वहन निस्स्वार्थ भाव से करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

लेखक एवं संकलनकर्ता 

डॉ राधेश्याम गुप्ता 

4 अगस्त 2025 

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