श्लोक 2.13
"देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥"
हिंदी भावार्थ:
जिस प्रकार इस शरीर में जीवात्मा बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था को प्राप्त होता है, वैसे ही मृत्यु के बाद वह दूसरे शरीर को प्राप्त होता है। ज्ञानी पुरुष (धीर) इस परिवर्तन से मोह नहीं करता।
व्याख्या:
श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि आत्मा अमर है, वह केवल शरीर बदलती है। जैसे शरीर में अवस्थाएँ बदलती रहती हैं — बचपन से युवावस्था और फिर वृद्धावस्था — वैसे ही मृत्यु के बाद आत्मा नया शरीर धारण करती है। इसलिए मृत्यु एक सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिससे ज्ञानी विचलित नहीं होता।
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श्लोक 2.14
"मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥"
हिंदी भावार्थ:
हे कौन्तेय (अर्जुन), सर्दी-गर्मी, सुख-दुख आदि इंद्रियों के संपर्क से उत्पन्न होते हैं, ये अनित्य और क्षणिक हैं। तू उन्हें सहन कर, हे भरतवंशी।
व्याख्या:
श्रीकृष्ण अर्जुन को यह सिखाते हैं कि सुख-दुख, सर्दी-गर्मी आदि सब संसारिक अनुभव अस्थायी हैं। ये शरीर और इंद्रियों के संपर्क से उत्पन्न होते हैं और समय के साथ चले जाते हैं। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह इन द्वंद्वों को सहन करे और अपने धर्म (कर्तव्य) से विचलित न हो।
लेखक एवं संकलन कर्ता
डॉ राधेश्याम गुप्ता
2 अगस्त 2025
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