Saturday, 2 August 2025

श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 2 श्लोक संख्या 15 व16

 श्लोक संख्या 15:

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।

समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥

भावार्थ

हे पुरुषों में श्रेष्ठ (अर्जुन), जो मनुष्य सुख और दुःख को समान समझता है और इन दोनों में विचलित नहीं होता, जो धीर है, वही मोक्ष का अधिकारी बनता है।

व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्म-संयम का महत्व समझा रहे हैं। वे कहते हैं कि सच्चा धीर वही है जो जीवन के सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान जैसे द्वंद्वों से प्रभावित नहीं होता। जो व्यक्ति इन विकारों से ऊपर उठकर एक समभाव में स्थित रहता है, वह अपनी आत्मा को अमरता (अमृतत्व) के मार्ग पर ले जाता है। इसका अर्थ यह है कि ऐसे व्यक्ति को मोक्ष या परम शांति प्राप्त होती है। यह श्लोक अर्जुन को यह समझाता है कि युद्ध के परिणाम, चाहे वह जीत हो या हार, दोनों को समान दृष्टि से देखना चाहिए।

श्लोक संख्या 16:

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥

भावार्थ

असत्य वस्तु (शरीर) का कोई अस्तित्व नहीं होता और सत्य वस्तु (आत्मा) का कभी अभाव नहीं होता। इन दोनों का अंत (अंतिम सत्य) तत्त्वदर्शी (ज्ञानी) लोगों द्वारा देखा गया है।

व्याख्या -

यह श्लोक भगवत गीता के सबसे गहरे और महत्वपूर्ण श्लोकों में से एक है। इसमें श्रीकृष्ण आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता के सिद्धांत को स्थापित करते हैं।

 * नासतो विद्यते भावो: "असत्" का अर्थ है जो वस्तु क्षणभंगुर है, जिसका स्वरूप बदलता रहता है—जैसे हमारा शरीर और इस भौतिक संसार की वस्तुएँ। यह श्लोक बताता है कि इन नश्वर वस्तुओं का कोई वास्तविक और स्थायी अस्तित्व नहीं होता। वे आज हैं, कल नहीं।

 * नाभावो विद्यते सतः: "सत्" का अर्थ है जो सत्य है, जो शाश्वत है—अर्थात हमारी आत्मा। आत्मा न तो जन्म लेती है और न मरती है। यह कभी समाप्त नहीं होती।

 * उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः: ज्ञानी पुरुष या तत्त्वदर्शी वही हैं जिन्होंने इस सत्य को जान लिया है कि शरीर भले ही नष्ट हो जाए, लेकिन आत्मा हमेशा रहती है। वे इस भ्रम से ऊपर उठ चुके होते हैं कि शरीर ही सब कुछ है।

इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि जिन्हें वह मरा हुआ मानकर शोक कर रहे हैं, उनका शरीर ही नष्ट होगा, उनकी आत्मा नहीं। इसलिए शोक करना व्यर्थ है, क्योंकि आत्मा तो अमर है। यह ज्ञान अर्जुन को युद्ध करने के लिए प्रेरित करता है, क्योंकि वह अब समझ जाता है कि युद्ध में वह केवल नश्वर शरीरों को ही मार रहा है, अमर आत्माओं को नहीं।

लेखक व संकलन कर्ता 

डॉ राधेश्याम गुप्ता 

2 अगस्त 2025

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