Thursday, 31 July 2025

श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 2 श्लोक संख्या 11 और 12

 अध्याय 2 श्लोक संख्या 11

श्लोक:

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।

गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥

भावार्थ:

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "तुम उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक करने योग्य नहीं हैं, और ज्ञानियों जैसी बातें भी कर रहे हो। जो पंडित (ज्ञानी) होते हैं, वे न तो जीवित के लिए शोक करते हैं और न ही मृत के लिए।"

व्याख्या:

इस श्लोक से श्रीकृष्ण का उपदेश आरंभ होता है। वे सीधे अर्जुन की दुविधा और अज्ञान पर प्रहार करते हैं। अर्जुन को दो बातों के लिए फटकार लगाई जाती है: पहला, वह उन लोगों के लिए शोक कर रहा है जो वास्तव में शोक के योग्य नहीं हैं; और दूसरा, वह अपनी इस शोकपूर्ण स्थिति में भी ज्ञानियों जैसी बातें कर रहा है।

यहाँ श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा शाश्वत है। एक सच्चा पंडित या ज्ञानी इस सत्य को जानता है। इसलिए, वह न तो किसी के जन्म पर प्रसन्न होता है और न ही मृत्यु पर दुखी, क्योंकि वह जानता है कि आत्मा का न तो जन्म होता है और न ही मृत्यु। अर्जुन का शोक उसके अज्ञान का परिणाम है, क्योंकि वह शरीर को ही सब कुछ मान रहा है। इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण अर्जुन को उसके अज्ञान से जगाने का प्रयास करते हैं और उसे वास्तविक ज्ञान की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

श्लोक संख्या 12

श्लोक:

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।

न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥

भावार्थ:

भगवान कहते हैं, "न तो ऐसा कभी था कि मैं नहीं था, न तुम नहीं थे और न ये राजा लोग नहीं थे। और न ही ऐसा होगा कि भविष्य में हम सब नहीं रहेंगे।"

व्याख्या:

यह श्लोक आत्मा की अमरता के सिद्धांत का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि आत्मा अनादि और अनंत है। वे कहते हैं कि जिस प्रकार मैं, तुम और ये सभी राजा लोग वर्तमान में मौजूद हैं, उसी तरह हम सब भूतकाल में भी मौजूद थे और भविष्य में भी रहेंगे।

इस श्लोक से यह सिद्ध होता है कि शरीर का नाश होने पर भी आत्मा का अस्तित्व बना रहता है। आत्मा न तो जन्म लेती है और न मरती है। यह श्लोक अर्जुन के शोक की जड़ पर प्रहार करता है, क्योंकि अर्जुन यह सोचकर दुखी हो रहा है कि युद्ध में उसके प्रियजन मारे जाएँगे। श्रीकृष्ण उसे यह समझाते हैं कि तुम जिसे मृत्यु मान रहे हो, वह केवल शरीर का परिवर्तन है, आत्मा का नाश नहीं। इस प्रकार, यह श्लोक यह स्थापित करता है कि आत्मा नित्य, शाश्वत और अविनाशी है।

लेखक एवं संकलनकर्ता 

डॉ राधेश्याम गुप्ता 

1 अगस्त 2025

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