श्लोक 39:
श्लोक:
"एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु . बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥ (३९)"
अर्थ और व्याख्या:
हे पृथापुत्र (अर्जुन)! यह बुद्धि (ज्ञान-योग या सांख्य-योग के विषय में) तेरे लिए कही गई है, और अब तू निष्काम कर्म-योग के विषय में सुन. इस बुद्धि से कर्म करने पर तू कर्मों के बंधन से मुक्त हो सकेगा. यह श्लोक ज्ञान-योग और निष्काम कर्म-योग के महत्व को दर्शाता है, जहां निष्काम कर्म से मोक्ष की प्राप्ति संभव है.
श्लोक 40:
श्लोक:
"यनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते . स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ (४०)"
अर्थ और व्याख्या:
इस प्रकार निष्काम भाव से कर्म करने से न तो कोई हानि होती है और न ही फल-रूप दोष लगता है. अपितु, इस निष्काम कर्म-योग की थोड़ी-सी भी प्रगति जन्म-मृत्यु के महान भय से रक्षा करती है. यह श्लोक निष्काम कर्म-योग के लाभों को बताता है, जिसमें कर्मों का कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं होता और यह व्यक्ति को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाता है.
डॉ राधेश्याम गुप्ता
9 जुलाई 2025
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