श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 2
श्लोक संख्या 37 व 38
श्लोक37
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः।। (२.३७)
व्याख्या :
हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! यदि तू युद्ध करते हुए मारा जाता है, तो तुझे स्वर्ग की प्राप्ति होगी। और यदि तू युद्ध में जीत जाता है, तो पृथ्वी पर राज्य तथा ऐश्वर्य का सुख भोगेगा। इस प्रकार, दोनों ही स्थितियाँ तेरे लिए लाभकारी हैं — मृत्यु पर स्वर्ग और विजय पर पृथ्वी का राज्य। इसलिए तू अपने मन में दृढ़ निश्चय कर और युद्ध के लिए खड़ा हो जा।
यहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि योद्धा के लिए युद्ध में वीरगति पाना भी महान है और विजय प्राप्त करना भी। इसलिए अर्जुन को अपने कर्तव्य में डटे रहना चाहिए।
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श्लोक 38
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।। (२.३८)
व्याख्या :
हे अर्जुन! सुख-दुख, हानि-लाभ, और विजय-पराजय — इन सबको समान मानकर, तटस्थ भाव से केवल अपने कर्तव्य अर्थात धर्मयुद्ध के लिए ही युद्ध कर। यदि तू ऐसा करेगा तो पाप को प्राप्त नहीं होगा।
यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को निष्काम कर्मयोग का उपदेश दे रहे हैं — अर्थात फल की चिंता छोड़े बिना, केवल अपने धर्म (कर्तव्य) का पालन करना। सुख-दुख, हानि-लाभ, जीत-हार — ये सब जीवन के बदलते पहलू हैं। इनके मोह में पड़ना उचित नहीं। कर्तव्य ही सबसे बड़ा धर्म है, और वही करना चाहिए।
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संक्षेप में — श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि यदि वह युद्ध में मारा जाएगा तो स्वर्ग मिलेगा और अगर जीतेगा तो राज्य। इसलिए बिना फल की चिंता किए, कर्तव्य-बुद्धि से युद्ध कर, ताकि उसे कोई पाप न लगे।
डॉ राधेश्याम गुप्ता
11 जुलाई 2025
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