गीता के श्लोक 35 और उसका भावार्थ:
श्लोक:
"भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः . येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ (३५)"
भावार्थ:
"जिन-जिन योद्धाओं की दृष्टि में तू पहले सम्मानित हुआ है, वे महारथी लोग तुझे डर के कारण युद्ध-भूमि से हटा हुआ समझ कर तुच्छ मानेंगे. (३५)"
विस्तृत व्याख्या:
यह श्लोक महाभारत के संदर्भ में अर्जुन से कहा गया है, जब वह युद्ध करने से हिचकिचा रहे थे. इस श्लोक में यह बताया गया है कि यदि अर्जुन युद्ध से पीछे हटते हैं, तो जिन महान योद्धाओं की नज़र में वे पहले अत्यंत सम्मानित थे, वही योद्धा उन्हें डरपोक समझकर तुच्छ मानेंगे. इससे अर्जुन की प्रतिष्ठा और सम्मान को भारी ठेस पहुंचेगी और उन्हें समाज में हीन दृष्टि से देखा जाएगा. यह श्लोक अर्जुन को उनके क्षत्रिय धर्म और सम्मान की याद दिलाता है.
श्लोक 36 और उसका भावार्थ:
श्लोक:
"अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः . निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥ (३६)"
भावार्थ:
"तेरे शत्रु तेरी सामर्थ्य की निंदा करते हुए तुझे बहुत से कटु वचन भी कहेंगे, तेरे लिये इससे अधिक दुःखदायी और क्या हो सकता है? (३६)"
विस्तृत व्याख्या:
यह श्लोक भी अर्जुन को युद्ध से विमुख होने के परिणामों के बारे में चेतावनी देता है. इसमें कहा गया है कि यदि अर्जुन युद्ध नहीं करते हैं, तो उनके शत्रु उनकी शक्ति और पराक्रम की निंदा करते हुए उन्हें अपशब्द कहेंगे. ऐसे कटु वचन सुनना किसी भी वीर के लिए अत्यंत अपमानजनक और दुःखदायी होता है. श्लोक इस बात पर बल देता है कि अपनी सामर्थ्य पर संदेह करना और उसके कारण अपमानित होना, मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक हो सकता है. यह अर्जुन को अपने कर्तव्य का पालन करने और सम्मान की रक्षा के लिए प्रेरित करता है.
डॉ राधेश्याम गुप्ता
11 जुलाई 2025
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