**अब तो शहद खाने के दिन आए**
🙏🙏
*हे प्रभु,*
कुछ तो ऐसा हो जाए,
कि पत्नी की आवाज़ थोड़ी धीमी हो जाए,
और पति का गुस्सा थोड़ा कम हो जाए।
बुढ़ापा है यारों,
इसे प्यार से संभाला जाए।
ज़िंदगी मधुमक्खी-सी रही,
सारी मेहनत छत्ता बनाने में गुजर गई ।
अब तो वक्त आ गया है —
शहद के मीठे स्वाद का रस आनंद लेने का
आओ, हँसी की मिठास घोलकर
शहद का रसानंद उठाया जाए यारों।
यह उम्र है दोस्तों,
जहाँ ज़्यादा कहना और कम सुनना भी एक कला है।
कभी-कभी…
खुद को कलाकार बना लिया जाये यारों ।
जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर माफ कर दो सबकुछ अहंकार और नफरत को हटाया जाए यारो ।
माना सफर लंबा था,
कभी काँटे, कभी फूल मिलते रहे।
खट्टी-मीठी सी है ज़िंदगी, अब बचपन याद करो यारों।
तेल जल गया, कालिख उड़ गई,
अब उजाला देखो यारो
अब दिल से कहो —
और माहौल खुशनुमा बनाया जाए यारों।
चलो, अब एक-दूसरे को संभालते हैं,
थोड़ा-थोड़ा बदलकर
रिश्तों को और भी ख़ास बनाते हैं यारों।
कुछ ऐसा हो जाए,
कि बातें सिर्फ मुस्कान की हों।
चलो कुछ ऐसा करते हैं,
बुढ़ापा शांति और आराम की हो जाये यारों।
शहद खाने के दिन तो अब आए हैं
आओ थोड़ा-थोड़ा चखते हैं यारों।
डॉ. राधेश्याम गुप्ता
दिनांक: 9 जुलाई 2025
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