अध्याय 3 श्लोक 16 (गीता 3.16)
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥
हिंदी भावार्थ :
हे पार्थ! जो मनुष्य इस प्रकार प्रवर्तित (चल रहे) यज्ञ-चक्र का अनुगमन नहीं करता, वह पापमय जीवन जीता है। वह केवल इन्द्रियों में रमण करने वाला है और उसका जीवन व्यर्थ होता है।
व्याख्या :
भगवान यहाँ स्पष्ट करते हैं कि जो मनुष्य यज्ञ-चक्र (त्याग, सहयोग और कर्तव्य पर आधारित नियम) को नहीं मानता,
उसका जीवन पापमय हो जाता है।
वह केवल भोग-विलास और इन्द्रियों की तृप्ति में डूबा रहता है।
ऐसे व्यक्ति का जीवन व्यर्थ और निष्फल होता है।
अर्थात्, जीवन का उद्देश्य केवल भोग नहीं, बल्कि कर्तव्य और यज्ञ-भाव से कर्म करना है---
श्लोक 17 (गीता 3.17)
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥
हिंदी भावार्थ :
परंतु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करता है, आत्मा में ही तृप्त रहता है और आत्मा में ही संतुष्ट है – उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है।
व्याख्या :
यह श्लोक उन महापुरुषों की स्थिति का वर्णन करता है जो आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त हो चुके हैं।
ऐसे ज्ञानी को बाहरी कर्म की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि वह भीतर से ही पूर्ण और संतुष्ट होता है।
वह आत्मा में ही रमा रहता है, उसी में तृप्त और प्रसन्न रहता है।
उसके लिए कर्मबंधन या यज्ञ की अनिवार्यता नहीं रहती।
निष्कर्ष अथवा सारांश श्लोक 16–17):
(16): जो मनुष्य यज्ञ-चक्र का पालन नहीं करता, उसका जीवन पाप और व्यर्थता में बीतता है।
(17): परंतु जो आत्मज्ञानी, आत्मतृप्त और आत्मसंतुष्ट है, उसके लिए कोई बाहरी कर्तव्य नहीं रहता।
लेखक एवं संकलनकर्ता
डॉ राधेश्याम गुप्ता
1 अक्टूबर 2025
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