अध्याय 3: कर्मयोग |
श्लोक 18
नैव तस्य कृतेनार्थोनाकृतेनेह कश्चन। न चास्य सर्वभूतेषुकश्चिदर्थव्यपाश्रयः।।
भावार्थ:
"ज्ञानीपुरुष के लिए इस लोक में न तो कोई कर्म करने से कोई प्रयोजन (लाभ) रह जाता है, और न ही कर्म न करने से कोई हानि होती है। तथा उसे सभी प्राणियों में से किसी पर (फल की प्राप्ति के लिए) निर्भर नहीं रहना पड़ता।"
व्याख्या:
इस श्लोक मेंउस ज्ञानी पुरुष (श्लोक 16 और 17 में वर्णित) की अवस्था को और स्पष्ट किया गया है। ऐसा व्यक्ति स्वयं को कर्ता नहीं मानता, बल्कि ईश्वर का साधक मानता है। इसलिए:
· कर्म करने से लाभ नहीं: वह पहले ही आत्म-तृप्त है, इसलिए कर्मों के फल से उसे कोई व्यक्तिगत लाभ प्राप्त करने की इच्छा नहीं होती।
· कर्म न करने से हानि नहीं: चूंकि वह आसक्ति रहित होकर कर्म करता है, इसलिए कर्म न करने के भय या दोष से भी मुक्त है।
· किसी पर निर्भर नहीं: उसे अपने जीवन-निर्वाह या किसी भी प्रकार की पूर्ति के लिए दूसरे प्राणियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता, क्योंकि वह ईश्वर में पूर्णतया समर्पित है और उसी को सब कुछ मानता है।
अध्याय 3: कर्मयोग |
श्लोक 19
तस्मादसक्तःसततं कार्यं कर्म समाचर। असक्तोह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः।।
भावार्थ:
"अतःतू आसक्ति रहित होकर सदैव करने योग्य कर्मों का नियमपूर्वक आचरण कर, क्योंकि आसक्ति रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परब्रह्म (परमात्मा) को ही प्राप्त होता है।"
व्याख्या:
यह श्लोक अर्जुन केलिए, और हम सभी साधकों के लिए, एक सीधा एवं स्पष्ट निर्देश है। पिछले श्लोकों में ज्ञानी की विशेषताएं बताने के बाद, अब भगवान कृष्ण व्यावहारिक उपदेश देते हैं:
· "असक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर": यह कर्मयोग का सारतत्व है। इसमें कर्म का त्याग नहीं, बल्कि उसे आसक्ति (लगाव/फल की इच्छा) रहित होकर करने का निर्देश है। 'सततं' (सदैव) शब्द महत्वपूर्ण है, जो दर्शाता है कि निष्काम कर्म जीवन भर चलने वाली साधना है।
· "परमाप्नोति पूरुषः": यह निष्काम कर्म का अंतिम लक्ष्य बताया गया है। कर्मफल का त्याग करने वाला व्यक्ति संसार के भोगों को नहीं, बल्कि 'परम' अर्थात सर्वोच्च लक्ष्य 'परमात्मा' को प्राप्त करता है। इस प्रकार कर्मयोग मोक्ष का सीधा मार्ग बन जाता है।
संक्षेप में निष्कर्ष अथवा सारांश
· श्लोक 18: ज्ञानी पुरुष की पूर्ण मुक्ति का दर्शन कराता है। उसके लिए न कर्म करने का कोई लाभ है, न न करने का कोई दोष, और न ही वह किसी सांसारिक सत्ता पर निर्भर रहता है।
· श्लोक 19: यह हम सामान्य साधकों के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन है - बिना रुके, बिना आसक्ति के, अपने नियत कर्म करते रहो, क्योंकि यही कर्म तुम्हें परमात्म-प्राप्ति तक ले जाएंगे।
इन दोनों श्लोकों में एक सुन्दर अंतर्संबंध है - श्लोक 18 में जो लक्ष्य (ज्ञानी की अवस्था) बताई गई है, श्लोक 19 में उसे प्राप्त करने का साधन (निष्काम कर्म) बताया गया है।
लेखक एवं संकलन कर्ता
डॉ राधेश्याम गुप्ता
दिनांक 1अक्टूबर 2025
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