Tuesday, 26 August 2025

श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 1 श्लोक संख्या 31 से 37

 

श्लोक 31:

न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।

किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥१-३१॥

​हिंदी अनुवाद:

​"हे कृष्ण, मैं न तो विजय की कामना करता हूँ, न राज्य की और न ही सुखों की। हे गोविन्द! हमें ऐसे राज्य से क्या लाभ और ऐसे भोगों और जीवन से क्या फायदा?"

​भावार्थ:

​अर्जुन की निराशा इतनी गहरी है कि वह युद्ध के सभी संभावित परिणामों—विजय, राज्य और सुख—को तुच्छ मानने लगे हैं। वह कहते हैं कि यदि यह सब अपने ही लोगों को मारकर प्राप्त होता है, तो उसका कोई मूल्य नहीं है।

​व्याख्या:

​यह श्लोक अर्जुन की मानसिक अवस्था का चरम बिंदु है। जिस राज्य को पाने के लिए वे युद्ध कर रहे थे, अब वही राज्य उन्हें निरर्थक लगने लगा है। यह दर्शाता है कि अर्जुन के लिए भौतिक लाभ से अधिक मानवीय संबंध और नैतिकता महत्वपूर्ण हैं। वह केवल भौतिकवादी लक्ष्यों से प्रेरित नहीं हैं, बल्कि उनके निर्णय नैतिक मूल्यों पर आधारित हैं।

​श्लोक 32:

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।

त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणान्स्त्यक्त्वा धनानि च॥१-३२॥

​हिंदी अनुवाद:

​"जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुख चाहते हैं, वे सभी अपने जीवन और धन की परवाह किए बिना यहाँ युद्ध में खड़े हैं।"

​भावार्थ:

​अर्जुन यहाँ अपनी दुविधा का कारण बताते हैं। वे कहते हैं कि जिन लोगों को राज्य और सुख का उपभोग करना था, वे ही आज विरोधी बनकर सामने खड़े हैं और अपने प्राणों को त्यागने के लिए तैयार हैं।

​व्याख्या:

​इस श्लोक में अर्जुन एक विरोधाभास की ओर इशारा करते हैं। वे कहते हैं कि युद्ध का उद्देश्य उन प्रियजनों के लिए सुख और समृद्धि प्राप्त करना था, लेकिन आज वे ही उनके विनाश का कारण बन रहे हैं। यह स्थिति अर्जुन को पूरी तरह से विचलित कर देती है। यह युद्ध को एक निरर्थक और विनाशकारी कार्य के रूप में प्रस्तुत करता है।

​श्लोक 33:

आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।

मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा॥१-३३॥

​हिंदी अनुवाद:

​"गुरु, पिता, पुत्र, दादा, मामा, ससुर, पौत्र, साले और अन्य सभी संबंधी भी यहाँ खड़े हैं।"

​भावार्थ:

​अर्जुन उन सभी संबंधों की सूची देते हैं जो विरोधी पक्ष में खड़े हैं। यह उनके मन के दुख को और अधिक बढ़ाता है क्योंकि वे देखते हैं कि उन्हें अपने सभी प्रियजनों के साथ लड़ना पड़ेगा।

​व्याख्या:

​यह श्लोक अर्जुन के व्यक्तिगत संबंधों की गहराई को दर्शाता है। वे केवल एक समूह के रूप में नहीं, बल्कि हर एक रिश्ते को याद करते हैं। यह दुख अर्जुन के युद्ध करने के संकल्प को हिला देता है। वे सोचने लगते हैं कि क्या इन सभी पवित्र संबंधों का अंत युद्ध में रक्तपात से होना चाहिए।

​श्लोक 34 :

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।

अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥१-३४॥

श्लोक संख्या 35

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।

​हिंदी अनुवाद:

​"हे मधुसूदन (कृष्ण), भले ही ये मुझे मार डालें, मैं इन्हें मारना नहीं चाहता हूँ, चाहे इसके बदले में मुझे तीनों लोकों का राज्य भी मिल जाए, फिर इस पृथ्वी के राज्य की तो बात ही क्या है! हे जनार्दन, इन धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता मिलेगी?"

​भावार्थ:

​अर्जुन कहते हैं कि वे किसी भी कीमत पर इन प्रियजनों को मारना नहीं चाहते, भले ही वे उन्हें मारने के लिए तैयार हों। वे कहते हैं कि तीनों लोकों का राज्य भी इन लोगों के जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है। वह पूछते हैं कि इन लोगों को मारकर क्या खुशी मिलेगी?

​व्याख्या:

​यह श्लोक अर्जुन की गहरी नैतिकता और उनके अहिंसक स्वभाव को दर्शाता है। वे जानते हैं कि वे युद्ध जीत सकते हैं, लेकिन इस जीत की कीमत बहुत अधिक होगी। यह श्लोक यह भी बताता है कि अर्जुन के लिए युद्ध विजय से अधिक न्याय और धर्म का प्रश्न था, लेकिन अब वे महसूस करते हैं कि इस युद्ध में कोई भी पक्ष विजयी नहीं हो सकता, क्योंकि इसका परिणाम केवल विनाश ही होगा।

​श्लोक 36:

पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः।

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्सबान्धवान्॥१-३६॥

श्लोक संख्या 37

स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥१-३७॥

​हिंदी अनुवाद:

​"इन आततायियों को मारकर हम पर पाप लगेगा। इसलिए हमें इन धृतराष्ट्र के पुत्रों को और उनके संबंधियों को नहीं मारना चाहिए। हे माधव (कृष्ण), अपने ही स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी हो सकते हैं?"

​भावार्थ:

​अर्जुन इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यदि वे अपने ही लोगों को मारते हैं, तो वे पाप के भागी बनेंगे। वे कहते हैं कि अपने ही लोगों की हत्या करके कोई भी व्यक्ति सुखी नहीं हो सकता।

​व्याख्या:

​अर्जुन यहाँ एक कानूनी और नैतिक तर्क प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि 'आततायी' (हमलावर) को मारना धर्मसम्मत हो सकता है, लेकिन जब आततायी अपने ही लोग हों, तो यह पाप है। यह श्लोक अर्जुन के मन की दुविधा को पूरी तरह से प्रकट करता है। वे धर्म और अधर्म के बीच फंस गए हैं और यह नहीं समझ पा रहे हैं कि सही रास्ता क्या है। उनका प्रश्न, "अपने ही स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी हो सकते हैं?" पूरी मानवता के लिए एक शाश्वत प्रश्न है।

लेखक एवं संकलन कर्ता 

डॉ राधेश्याम गुप्ता 

दिनांक 26 अगस्त 2025

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