Tuesday, 26 August 2025

श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 1 श्लोक संख्या 26 से 30

 

श्लोक 26:

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृनथ पितामहान्।

आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥१-२६॥ 

श्लोक संख्या 27

श्वशुरान्सुहृदश्चैवसेनयोरुभयोरपि।

तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्॥१-२७॥

​हिंदी अनुवाद:

​"वहाँ अर्जुन ने दोनों सेनाओं में खड़े हुए अपने पिता, पितामह (दादा), गुरुओं, मामा, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, श्वसुरों और शुभचिंतकों को देखा।"

​भावार्थ:

​जब अर्जुन ने रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले जाकर देखा, तो उन्हें अपने सामने अपने ही संबंधी और पूजनीय व्यक्ति दिखाई दिए। ये वे लोग थे जिनके साथ उनका गहरा भावनात्मक और पारिवारिक संबंध था।

​व्याख्या:

​यह श्लोक अर्जुन की मनःस्थिति में आए बदलाव का पहला संकेत है। जब तक वह युद्ध के मैदान से दूर था, तब तक वह इसे एक धर्मयुद्ध मान रहा था। लेकिन जब वह अपने सामने अपने प्रियजनों को देखता है, तो उसकी करुणा और मोह जागृत हो जाते हैं। युद्ध की सैद्धांतिक धारणा और उसकी क्रूर वास्तविकता के बीच का अंतर अर्जुन के मन में एक गहरा द्वंद्व पैदा करता है।

​श्लोक 28:

कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥१-२८॥

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।

​हिंदी अनुवाद:

​"उसने अत्यंत करुणा से भर कर और दुखी होकर यह कहा, 'हे कृष्ण, इस अपने ही स्वजन समूह को युद्ध करने के लिए तैयार देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मुँह सूख रहा है।"

​भावार्थ:

​अपने प्रियजनों को विरोधी सेना में देखकर अर्जुन का मन अत्यंत दुख और करुणा से भर गया। उनके शरीर में शारीरिक और मानसिक बदलाव आने लगे।

​व्याख्या:

​यह श्लोक अर्जुन के विषाद योग का मूल है। 'विषाद' का अर्थ है गहरा दुख या निराशा। अर्जुन की करुणा केवल भावनात्मक नहीं है, बल्कि उसके शरीर पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है, जैसे अंगों का शिथिल होना और मुँह का सूखना। यह मनोवैज्ञानिक स्थिति युद्ध करने की उसकी इच्छा को पूरी तरह से खत्म कर देती है।

​श्लोक 29:

वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते।

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते॥१-२९॥

​हिंदी अनुवाद:

​"मेरे शरीर में कंपन हो रहा है और रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव (धनुष) गिर रहा है और त्वचा में जलन हो रही है।"

​भावार्थ:

​अर्जुन की निराशा और करुणा का प्रभाव इतना गहरा है कि उनका शरीर कांपने लगता है, और उनके हाथ से उनका प्रिय गाण्डीव धनुष भी छूटने लगता है।

​व्याख्या:

​इस श्लोक में अर्जुन के विषाद का शारीरिक वर्णन मिलता है। यह दर्शाता है कि उनकी मनःस्थिति कितनी अस्थिर हो गई है। गाण्डीव धनुष अर्जुन के लिए केवल एक हथियार नहीं था, बल्कि उनकी पहचान और उनकी वीरता का प्रतीक था। उसका हाथ से छूटना इस बात का प्रतीक है कि अर्जुन युद्ध करने की अपनी मानसिक और शारीरिक शक्ति खो चुके हैं।

​श्लोक 30:

न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः।

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव॥१-३०॥

​हिंदी अनुवाद:

​"हे केशव (कृष्ण), मैं यहाँ ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा हूँ और मेरा मन भ्रमित हो रहा है। मैं केवल अशुभ लक्षणों को देख रहा हूँ।"

​भावार्थ:

​अर्जुन युद्ध करने में पूरी तरह से असमर्थ महसूस कर रहे हैं। उनका मन भ्रमित है और वे अपने भविष्य के बारे में केवल नकारात्मक संकेत देख रहे हैं।

​व्याख्या:

​यह श्लोक अर्जुन के विषाद को और गहरा करता है। वह न केवल शारीरिक रूप से कमजोर महसूस कर रहे हैं, बल्कि मानसिक रूप से भी पूरी तरह से विचलित हैं। 'अशुभ लक्षण' देखने की बात उनके गहरे निराशावाद को दर्शाती है। इस अवस्था में, अर्जुन को लगता है कि यह युद्ध केवल विनाश और दुख लाएगा, जिससे कोई भी लाभ नहीं होगा। इसी बिंदु से भगवान कृष्ण उन्हें ज्ञान का उपदेश देना शुरू करते हैं।

लेखक एवं संकलन कर्ता 

डॉ राधेश्याम गुप्ता 

दिनांक 26 अगस्त 2025

No comments:

Post a Comment

डॉ राधेश्याम गुप्ता के के विचार

        वित्तीय दर्शन “सत्य, श्रम और ज्ञान के संग निवेश — एक स्वच्छ मार्ग की खोज” जीवन में धन कमाने से अधिक कठिन है — उसे ईमानदारी, विवेक और...