Tuesday, 15 July 2025

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 41 42 व 43

श्लोक 2.41


> व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।

बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥




🪷 भावार्थ:


हे कुरुनन्दन (अर्जुन)! इस निष्काम कर्म-योग में दृढ़ निश्चय वाली बुद्धि एक ही होती है,

परन्तु जो निश्चय में दृढ़ नहीं हैं, उनकी बुद्धि असंख्य शाखाओं में बिखरी रहती है।


व्याख्या:


जो व्यक्ति जीवन में एक उद्देश्य लेकर चलता है — जैसे मोक्ष, आत्मज्ञान या सच्ची शांति — उसकी सोच एकदम स्पष्ट और स्थिर रहती है।

परंतु जो लोग संसार की छोटी-छोटी इच्छाओं के पीछे भागते हैं, वे भटकते रहते हैं।

इसलिए श्रीकृष्ण हमें यही सिखाते हैं कि – अपने लक्ष्य को लेकर एकनिष्ठ बनो, भ्रमित मत होओ।

श्लोक 2.42


> यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।

वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥




🪷 भावार्थ:


हे पार्थ! वे अल्प-बुद्धि मनुष्य वेदों की उन पुष्पित वाणियों में आसक्त रहते हैं,

जो भोग-सुख और स्वर्ग की प्राप्ति के लिए सुंदर शब्दों में कर्मकाण्डों का वर्णन करती हैं।

वे मानते हैं कि इससे बढ़कर और कुछ नहीं है।



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श्लोक 2.43


> कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।

क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥




🪷 भावार्थ:


ऐसे लोग कामनाओं से भरे होते हैं, जो स्वर्ग और उत्तम जन्म की इच्छा रखते हैं।

वे अनेक क्रियाओं और कर्मों का वर्णन करते हैं, जिनसे भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति हो।

इन्हीं को वे जीवन की चरम उपलब्धि मानते हैं।



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🌼 समग्र व्याख्या:


इन श्लोकों में श्रीकृष्ण दो बातों पर ज़ोर देते हैं:


1. एकनिष्ठ और निश्चयी बुद्धि:ऐ

जो व्यक्ति जीवन के सच्चे उद्देश्य को जानता है, उसकी बुद्धि लक्ष्य की ओर स्थिर रहती है। वह भटकता नहीं।



2. भोग-सुख के प्रति आसक्ति से बचाव:

वेदों में कर्मकाण्ड और स्वर्ग की बातें भी हैं, परंतु जो केवल भोग और स्वर्ग की लालसा से प्रेरित हैं, वे आत्म-कल्याण से दूर हो जाते हैं।

श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे लोग समझते हैं कि इन्द्रिय-सुख ही सब कुछ है, परंतु सच्चा सुख आत्मा की शांति में है।


डॉ राधेश्याम गुप्ता

16 जुलाई 2025

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