श्लोक संख्या ४६):
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ (४६)
भावार्थ : सभी तरफ़ से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय के प्रति मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को तत्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों से उतना ही प्रयोजन रह जाता है। (४६)
व्याख्या:
यह श्लोक बताता है कि जिस प्रकार एक बड़े और सभी ओर से जल से भरे हुए जलाशय के मिल जाने पर, छोटे तालाब या कुएं से मनुष्य का कोई खास प्रयोजन नहीं रह जाता (क्योंकि उसकी सारी आवश्यकताएँ बड़े जलाशय से पूरी हो जाती हैं), उसी प्रकार ब्रह्म को तत्व से जानने वाले ज्ञानी ब्राह्मण के लिए समस्त वेदों का प्रयोजन उतना ही रह जाता है। इसका अर्थ यह है कि जिसने परम सत्य (ब्रह्म) का साक्षात्कार कर लिया है, उसके लिए वेदों का ज्ञान गौण हो जाता है, क्योंकि वेदों का अंतिम लक्ष्य भी ब्रह्म ज्ञान ही है। एक बार जब लक्ष्य प्राप्त हो जाता है, तो साधन (वेद) का महत्व कम हो जाता है। यह ज्ञान की अंतिम अवस्था को दर्शाता है जहाँ व्यक्ति वेदों के शब्दों से परे जाकर स्वयं सत्य का अनुभव कर लेता है।
श्लोक (श्लोक संख्या ४७):
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥
भावार्थ
तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में अधिकार नहीं है, इसलिए तू न तो अपने-आप को कर्मों के फलों का कारण समझ और कर्म न करने में तेरी आसक्ति भी न हो। (४७)
व्याख्या:
यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का एक बहुत ही प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण श्लोक है, जो कर्म योग का सार है।
* "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन": इसका अर्थ है कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर कभी नहीं। हमें अपने कर्तव्य कर्म को पूरी निष्ठा और लगन से करना चाहिए, लेकिन उसके परिणाम या फल पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता। फल देना या न देना प्रकृति या ईश्वर के हाथ में है।
* "मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा": इसका अर्थ है कि तुम अपने-आप को कर्म के फल का कारण मत समझो। हमें कर्म इसलिए नहीं करना चाहिए कि हमें उसका कोई विशेष फल मिलेगा। यदि हम फल की इच्छा से कर्म करते हैं, तो हम उसके बंधन में बंध जाते हैं। निष्काम कर्म का अर्थ है कि कर्म करते समय फल की इच्छा न रखना।
* "ते संगोऽस्त्वकर्मणि": इसका अर्थ है कि तुम्हारी आसक्ति अकर्मण्यता (कर्म न करने) में भी नहीं होनी चाहिए। सिर्फ इसलिए कि हमें फल की चिंता नहीं करनी, इसका मतलब यह नहीं है कि हम कर्म करना ही छोड़ दें। कर्म करना मनुष्य का स्वभाव है और कर्तव्य भी। निष्क्रियता भी एक प्रकार का बंधन है और यह कर्तव्य से विमुख होने जैसा है।
संक्षेप में, यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमें अपना कर्तव्य बिना किसी फल की आशा के करना चाहिए और साथ ही कर्म करने से विमुख भी नहीं होना चाहिए। यह अनासक्त होकर कर्म करने का उपदेश है, जो मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है।
डॉ राधेश्याम गुप्ता
ग्राम 17 जुलाई 2025
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