श्लोक 60
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥
हिंदी भावार्थ:
हे अर्जुन! इन्द्रियाँ इतनी प्रबल और चंचल हैं कि जो मनुष्य ज्ञानी और विवेकी होने पर भी उन्हें वश में करने का प्रयास करता है, उसकी चेतना को भी वे बलपूर्वक हर लेती हैं।
व्याख्या:
यह श्लोक यह स्पष्ट करता है कि इन्द्रियाँ (ज्ञान और कर्मेन्द्रियाँ) बहुत बलशाली, चंचल और आकर्षण में डालने वाली होती हैं। 'विपश्चितः' अर्थात् विवेकशील और ज्ञानी व्यक्ति भी जब इन्द्रियों को वश में करने का प्रयास करता है, तब भी इनका वेग इतना तीव्र होता है कि मन को चुराकर विषयों की ओर ले जाती हैं।
यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को सावधान कर रहे हैं कि ज्ञान मात्र से मुक्ति नहीं मिलती, जब तक इन्द्रियों का पूर्ण संयम न हो। यह इन्द्रियाँ मन को अपने अधीन कर लेती हैं और विवेक को भी डगमगा देती हैं।
श्लोक 61
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
हिंदी भावार्थ:
जो मनुष्य इन्द्रियों को पूरी तरह से वश में रखते हुए अपनी चेतना को मुझ (भगवान) में स्थिर करता है, वही मनुष्य स्थिर बुद्धि वाला और आत्म-ज्ञानी कहलाता है।
व्याख्या:
इस श्लोक में श्रीकृष्ण उपाय बताते हैं —
संपूर्ण इन्द्रियों को संयम में रखना ही पहला कदम है। और यह तभी संभव है जब व्यक्ति अपने चित्त को "मत्परः", अर्थात् भगवान में स्थिर करे।
जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं और चित्त ईश्वर में लगा है, वही व्यक्ति सच्चे अर्थों में "प्रज्ञा प्रतिष्ठिता" — स्थिर-बुद्धि वाला कहलाता है।
निष्कर्ष (संक्षिप्त सार):
इन्द्रियाँ अत्यंत शक्तिशाली होती हैं, वे विवेकी का मन भी डिगा देती हैं।
जो व्यक्ति इन्द्रियों को वश में कर अपनी चेतना को ईश्वर में स्थिर करता है, वही सच्चा ज्ञानी और आत्म-स्थिर कहलाता है।
लेखक एवं संकलन कर्ता
डॉ राधेश्याम गुप्ता
24 जुलाई 2025
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