Tuesday, 22 July 2025

श्रीमद्भागवत गीता श्लोक संख्या 58व59

 अध्याय 2 श्लोक 58:


श्लोक:
 यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वश:।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।



हिंदी भावार्थ: जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, उसी प्रकार जब मनुष्य अपनी इंद्रियों को इंद्रिय-विषयों से पूरी तरह हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।

व्याख्या: इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण आत्मसंयम की उपमा देते हुए कहते हैं कि जैसे कछुआ अपने हाथ-पैर और सिर को खींचकर खोल में छिपा लेता है, वैसे ही एक ज्ञानी व्यक्ति अपनी इंद्रियों को विषयों से खींच लेता है।
यहाँ “इन्द्रियार्थेभ्यः” का तात्पर्य है — दृश्य, श्रव्य, स्पर्श, स्वाद, गंध आदि इन्द्रियों के विषय।
जब मनुष्य इन विषयों में लिप्त नहीं होता, तब वह आत्म-साक्षात्कार की ओर बढ़ता है और उसकी बुद्धि "प्रज्ञा प्रतिष्ठिता" अर्थात स्थिर एवं जागरूक होती है।

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श्लोक 59:

श्लोक:
 विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन:।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।।


हिंदी भावार्थ: इंद्रियों से विषय भले ही दूर हो जाएं, लेकिन विषयों में आसक्ति बनी रहती है। जब मनुष्य परम तत्व का अनुभव करता है, तभी वह आसक्ति भी नष्ट हो जाती है।


व्याख्या: इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि केवल बाहरी संयम पर्याप्त नहीं है।

कोई व्यक्ति उपवास या तपस्या के द्वारा इंद्रिय विषयों से भले ही दूर हो जाए ("निराहारस्य"), लेकिन मन में उन विषयों की इच्छा ("रस") बनी रहती है।

केवल जब मनुष्य आत्मा या परमात्मा के "परं दृष्ट्वा" — उच्च अनुभव को प्राप्त करता है, तभी वह विषयों के प्रति आकर्षण ("रसोऽपि") भी छोड़ देता है।


यह एक गहन मनोवैज्ञानिक सत्य है — केवल दमन नहीं, बल्कि परम की अनुभूति ही पूर्ण वैराग्य लाती है।

---सारांश:


इन दोनों श्लोकों में भगवान श्रीकृष्ण यह समझा रहे हैं कि:


सच्चा योगी वही है जो अपनी इंद्रियों को नियंत्रित कर लेता है।


बाहरी संयम के साथ-साथ आंतरिक परिवर्तन और आत्मबोध जरूरी है।


परम सत्य का अनुभव ही इंद्रिय विषयों के प्रति आकर्षण को जड़ से मिटाता है।


डॉ राधेश्याम गुप्ता 

 23 जुलाई 2025




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डॉ राधेश्याम गुप्ता के के विचार

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