Sunday, 27 July 2025

श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 2 श्लोक संख्या 66 व 67

 श्लोक 66


नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।

न चाभावयतः शान्तिः अशान्तस्य कुतः सुखम्॥ (66)


भावार्थ:


जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ वश में नहीं होतीं, उसकी न तो बुद्धि स्थिर होती है, न ही उसका मन स्थिर रहता है। ऐसा व्यक्ति न शांति को प्राप्त करता है और न ही उसे सुख प्राप्त हो सकता है।


व्याख्या:

भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में कहते हैं कि जो मनुष्य आत्म-नियंत्रण से रहित है, यानी जिसकी इन्द्रियाँ विषयों की ओर भागती हैं और वह उन्हें रोक नहीं पाता, उसकी बुद्धि चंचल हो जाती है। चंचल बुद्धि वाला व्यक्ति कभी एकाग्र नहीं हो सकता, और जब तक मन एकाग्र न हो, तब तक शांति नहीं मिल सकती।

जब मनुष्य को शांति नहीं मिलती, तो आंतरिक सुख का अनुभव कैसे संभव है?

यह श्लोक हमें चेतावनी देता है कि आत्म-संयम, इन्द्रियों पर नियंत्रण और स्थिर बुद्धि के बिना जीवन में सच्चा सुख संभव नहीं।

--श्लोक 67


इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।

तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥ (67)


भावार्थ:

जिस प्रकार जल में चलती हुई नाव को तेज़ हवा अपनी दिशा में बहा ले जाती है, उसी प्रकार इन्द्रियों में से कोई एक भी इन्द्रिय, यदि मन को अपनी ओर खींच ले, तो वह मनुष्य की बुद्धि को विचलित कर देती है।

व्याख्या:

इस श्लोक में इन्द्रियों और मन के संबंध को बहुत सुंदर उपमा द्वारा समझाया गया है। जैसे पानी में चलती नाव अगर वायु के नियंत्रण में आ जाए, तो वह नाव रास्ते से भटक जाती है, उसी तरह यदि किसी एक इन्द्रिय का मन अनुसरण करने लगे (उदाहरण: आँखों से सुंदर वस्तु देखकर आकर्षित हो जाना), तो वह मनुष्य की विवेकशील बुद्धि को भी खींच लेती है।

इसी कारण भगवान कहते हैं कि इन्द्रियों को यदि नियंत्रण में न रखा जाए, तो वे मन को विषयों में उलझा कर व्यक्ति को विनाश की ओर ले जाती हैं।

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इन दोनों श्लोकों में भगवान श्रीकृष्ण आत्म-नियंत्रण और इन्द्रिय-निग्रह का महत्व समझा रहे हैं।


इन्द्रियाँ विषयों में रमने से मन को चंचल करती हैं।


चंचल मन बुद्धि को भ्रमित करता है।


बुद्धि का भ्रमित होना शांति और सुख से वंचित करता है।

लेखक एवं संकलनकर्ता 

डॉ राधेश्याम गुप्ता 

26 जुलाई 2025

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