Friday, 25 July 2025

श्रीमद् भगवत गीता अध्याय 2 श्लोक 64व65

 श्लोक 64
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥ (2.64)
हिंदी भावार्थ:
जो व्यक्ति राग (आसक्ति) और द्वेष (घृणा) से मुक्त होकर इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता है, परंतु आत्मवश (स्व-नियंत्रित) और अनुशासित मन वाला होता है — वह व्यक्ति ईश्वर की कृपा, अर्थात् आंतरिक शांति को प्राप्त करता है।
व्याख्या:
यह श्लोक बताता है कि मनुष्य का परम लक्ष्य केवल विषयों से निवृत्ति नहीं, बल्कि उन विषयों में रहते हुए भी राग और द्वेष से मुक्त रहना है।
मन और इन्द्रियों को नियंत्रण में रखकर, विषयों का संतुलित उपयोग करने वाला व्यक्ति जीवन में शांति, संतुलन और अंततः ईश्वर की कृपा प्राप्त करता है। यह आत्म-संयम ही वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति की सीढ़ी है।

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श्लोक 65
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥ (2.65)
हिंदी भावार्थ:
भगवान की कृपा प्राप्त होने पर मनुष्य के सभी दुखों का अंत हो जाता है, और प्रसन्नचित्त व्यक्ति की बुद्धि शीघ्र ही परमात्मा में स्थिर हो जाती है।
व्याख्या:
जब व्यक्ति ईश्वर की कृपा (अर्थात् आंतरिक शांति और संतुलन) को प्राप्त करता है, तब उसके सारे मानसिक और भावनात्मक दुख समाप्त हो जाते हैं।
इस अवस्था में मन शांत, बुद्धि स्थिर और निर्णय स्पष्ट हो जाते हैं।
प्रसन्नचित्तता ही उस दिव्य स्थिति का संकेत है जहाँ व्यक्ति अंतर्मन से शुद्ध, शांत और परमात्मा में स्थित होता है।
यह स्थिति उसे मोक्ष और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाती है।
--सारांश रूप में समझें:
श्लोक 64 आत्म-संयम और राग-द्वेष से मुक्त रहने की बात करता है।
श्लोक 65 बताता है कि जब व्यक्ति ऐसा करता है, तो उसे ईश्वर की कृपा से शांति, सुख, और स्थिर बुद्धि प्राप्त होती है।

यह जीवन में स्थायी आनंद और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है।

लेखक एवं संकलन कर्ता 

डॉ राधेश्याम गुप्ता 
दिनांक 26 जुलाई 2025

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डॉ राधेश्याम गुप्ता के के विचार

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