*माँ आनंदमयी के उपदेश*
: _(स्वभाव ही सच्चा धर्म है_ )
माँ आनंदमयी के गहन उपदेश हमें 'धर्म' की हमारी सामान्य समझ से परे ले जाते हैं। वे बताती हैं कि धर्म केवल रीति-रिवाजों या सामाजिक कर्तव्यों का पालन करना नहीं है, बल्कि हमारे वास्तविक और अपरिवर्तनीय स्वभाव को जानना और उसके अनुरूप जीना है। उनके अनुसार, आपका स्वभाव ही आपका सच्चा धर्म है, और यह धर्म कभी बदलता नहीं। जो कुछ भी बदलता है, वह वास्तव में अधर्म है।
नाम और नामी का अभेद
माँ मंत्र-चेतना को समझाते हुए कहती हैं कि नाम और नामी (जिसका नाम लिया गया है) में कोई भेद नहीं। जैसे, जब आप किसी को पुकारते हैं और वह तुरंत जवाब देता है, तो यह दर्शाता है कि नाम में ही उस व्यक्ति की चेतना निहित है। इसी तरह, जब कोई मंत्र इतना जीवंत हो जाता है कि उसके उच्चारण मात्र से ही उससे संबंधित देवता या शक्ति प्रकट हो जाती है, तो उसे 'सचेत मंत्र' या 'मंत्र चेतना' कहा जाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि नाम में ही उस सत्ता की चेतना विद्यमान है जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है।
कर्म की परिणति और सहज वैराग्य
कर्म के विषय में माँ का उपदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है: "जब कर्म के पूर्ण होने की अंतिम अवस्था आती है, तो किसी को कुछ भी त्यागने की आवश्यकता नहीं होती। त्याग अपने आप हो जाता है।" इसका अर्थ यह है कि सच्चा त्याग किसी बाहरी प्रयास का परिणाम नहीं, बल्कि आंतरिक परिपक्वता का स्वाभाविक फल है। जब व्यक्ति अपने कर्मों के सार को समझ लेता है और उनके बंधनों से मुक्त होने लगता है, तो संसार की वस्तुओं के प्रति आसक्ति स्वतः ही छूट जाती है। यह वैराग्य जबरन थोपा नहीं जाता, बल्कि यह सहज रूप से घटित होता है।
स्वधर्म बनाम परधर्म: स्वभाव की पहचान
भगवद गीता के 'स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः' श्लोक पर चर्चा करते हुए माँ ने धर्म की गहरी परिभाषा दी। उन्होंने कहा, "धर्म का क्या अर्थ है? वह जो धारण करता है।" फिर उन्होंने चोर का उदाहरण दिया: "चोर को उसके चोरी के ज्ञान से सहारा मिलता है, लेकिन फिर चोर साधु बन जाता है। ऐसी स्थिति में चोरी उसका स्वधर्म नहीं थी क्योंकि व्यक्ति का सच्चा धर्म कभी नहीं बदलता। जो बदलता है वह धर्म नहीं, वह अधर्म है। आपका स्वभाव ही धर्म है, बाकी सब परधर्म (अधर्म) है।"
यहाँ माँ स्पष्ट करती हैं कि चोरी करना चोर का स्थायी 'धर्म' नहीं हो सकता, क्योंकि जब वह बदलता है और साधु बनता है, तो वह इस व्यवहार को छोड़ देता है। उनका कहने का तात्पर्य यह है कि हमारा वास्तविक धर्म हमारी आंतरिक प्रकृति है, हमारा मूल स्वभाव है जो कभी नहीं बदलता। बाहरी भूमिकाएँ, आदतें या व्यवहार जो बदल सकते हैं, वे हमारे सच्चे धर्म का हिस्सा नहीं हैं। वे परधर्म या अधर्म हैं, क्योंकि वे परिवर्तनशील हैं।
संसार में धर्म की अभिव्यक्ति
माँ अंत में बताती हैं कि जैसे अग्नि और जल के अपने स्वभाव (धर्म) होते हैं, वैसे ही संस्कारों के कारण प्रत्येक व्यक्ति संसार में अपने स्वभाव को विभिन्न तरीकों से व्यक्त करता है। लेकिन गुरु की कृपा और शक्ति से, यह अभिव्यक्ति भी अंततः हमें ईश्वर की ओर मोड़ देती है।
***_कुल मिलाकर, माँ *आनंद मयी के उपदेश *हमें सिखाते हैं कि *सच्चा धर्म किसी बाहरी रूप में नहीं, बल्कि अपने अपरिवर्तनीय आंतरिक स्वभाव को पहचानने और उसके साथ एकाकार होने में निहित है। यही वास्तविक मुक्ति का मार्ग है।_
लेखक
डॉ राधेश्याम गुप्ता
दिनांक 18 जून 2025*
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