Sunday, 10 August 2025

श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 2 श्लोक संख्या 33 व 34

 श्लोक 33

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।

ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥

भावार्थ:

श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "यदि तुम इस धर्म युद्ध को नहीं लड़ोगे, तो तुम अपने क्षत्रिय धर्म का पालन नहीं करोगे और तुम्हारी कीर्ति (यश) नष्ट हो जाएगी। इसके बदले में तुम पाप के भागी बनोगे।"

व्याख्या:

इस श्लोक में श्री कृष्ण अर्जुन को उसके स्वधर्म के महत्व को समझा रहे हैं। अर्जुन एक क्षत्रिय है और उसका धर्म है कि वह धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करे। श्री कृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि युद्ध से भागना केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं है, बल्कि यह अपने कर्तव्य से मुँह मोड़ना है।

 * स्वधर्म: यहाँ स्वधर्म का अर्थ है व्यक्ति का अपना विशेष कर्तव्य, जो उसके वर्ण (क्षत्रिय) और आश्रम के अनुसार निर्धारित होता है। अर्जुन के लिए, युद्ध करना उसका सबसे बड़ा कर्तव्य है।

 * कीर्ति: उस समय, क्षत्रियों के लिए युद्ध में वीरता दिखाना और धर्म की रक्षा करना सबसे बड़ा यश माना जाता था। युद्ध से भागने पर उसकी सारी कीर्ति, जो उसने पहले अर्जित की थी, नष्ट हो जाएगी।

 * पाप: धर्म का पालन न करना पाप माना जाता है। युद्ध से भागने पर अर्जुन को न केवल अपमान मिलेगा, बल्कि वह अपने कर्तव्य से विमुख होने के कारण पाप का भागी भी बनेगा।

श्लोक 34

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।

सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते॥

भावार्थ:

श्री कृष्ण कहते हैं, "संसार के सभी लोग तुम्हारी अपार बदनामी की चर्चा करेंगे। एक सम्मानित व्यक्ति के लिए अपयश मृत्यु से भी बढ़कर होता है।"

व्याख्या:

यह श्लोक अर्जुन को सामाजिक और मानसिक परिणामों के बारे में चेतावनी देता है। अर्जुन एक महान योद्धा और सम्मानित राजकुमार है। श्री कृष्ण उसे याद दिलाते हैं कि यदि वह युद्ध से भागता है, तो लोग उसे कायर कहेंगे और उसकी बदनामी हमेशा के लिए हो जाएगी।

 * अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्: इसका अर्थ है कि सभी लोग, यहाँ तक कि भविष्य की पीढ़ियाँ भी, उसकी इस कायरता की बात करेंगे। 'अव्ययाम्' का अर्थ है जो कभी समाप्त न हो, यानी उसकी बदनामी अमर हो जाएगी।

 * सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते: यह इस श्लोक का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। एक प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्ति के लिए, समाज में अपमानित होकर जीना मृत्यु से भी ज़्यादा पीड़ादायक होता है। श्री कृष्ण इस बात को उजागर करते हैं कि शारीरिक मृत्यु एक बार होती है, लेकिन अपयश का दुख जीवन भर सहना पड़ता है।

संक्षेप में 

इन दोनों श्लोकों में, श्री कृष्ण अर्जुन को युद्ध लड़ने के लिए दो मुख्य तर्क देते हैं:

 * कर्तव्य (स्वधर्म): एक क्षत्रिय होने के नाते, युद्ध करना उसका धर्म है और इस धर्म का पालन न करने पर उसे पाप लगेगा।

 * सम्मान (कीर्ति): यदि वह युद्ध से भागता है, तो वह न केवल अपना सम्मान खो देगा, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों द्वारा भी उसे एक कायर के रूप में याद किया जाएगा। सम्मानित व्यक्ति के लिए अपमानित होकर जीना मृत्यु से भी बुरा होता है।

इस प्रकार, श्री कृष्ण अर्जुन को उसके व्यक्तिगत मोह और भय से ऊपर उठकर अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करने के लिए प्रेरित करते हैं।

लेखक एवं संकलन कर्ता 

डॉ राधेश्याम गुप्ता 

9 अगस्त 2025

No comments:

Post a Comment

डॉ राधेश्याम गुप्ता के के विचार

        वित्तीय दर्शन “सत्य, श्रम और ज्ञान के संग निवेश — एक स्वच्छ मार्ग की खोज” जीवन में धन कमाने से अधिक कठिन है — उसे ईमानदारी, विवेक और...