Sunday, 20 July 2025

श्री श्री माँ आनंदमयी के दिव्य वचन

 धर्म, आत्मबोध और ईश्वर का लीला रूप

 श्री श्री माँ आनंदमयी के दिव्य वचन 


"जहाँ से हो, वहीं से चलो — वही परमात्मा है, और कोई नहीं।"

 श्री श्री माँ आनंदमयी

हमारे जीवन की सबसे गूढ़ यात्रा आत्मबोध की यात्रा है। यह यात्रा बाहरी नहीं, बल्कि अंतर की गहराइयों में उतरने की प्रक्रिया है। इस मार्ग को माँ आनंदमयी ‘धर्म’ कहती हैं — वह धर्म जो केवल किसी परंपरा, कर्मकांड या जाति से जुड़ा नहीं, बल्कि हमारे अंतरतम में स्थित ईश्वर की ओर उठने का जीवंत प्रयास है।

धर्म क्या है?

 "अपने आत्मस्वरूप की प्राप्ति की ओर ले जाने वाला मार्ग कभी त्यागा नहीं जा सकता — यही 'धर्म' है।"

— मातृवाणी, #164

प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा का मार्ग अलग है, परंतु लक्ष्य एक ही — परमात्मा। जहाँ भी आप हैं, वहीं से आरंभ कीजिए। वही ईश्वर है, वही आधार है। माँ कहती हैं, "वही स्वयं 'सभी' बन जाता है और अपने ही साथ खेल खेल रहा है।"


अधर्म क्या है?

"जो क्रिया ईश्वर या सत्य की स्मृति से विमुख करे — वही अधर्म है।"

धर्म और अधर्म का मापदंड बाहर नहीं, भीतर है। कोई भी कार्य जो हमें ईश्वर की स्मृति में रखे, वही धर्म है; और जो इस स्मृति से दूर करे, वही अधर्म है। यह परिभाषा कितनी सरल, कितनी गूढ़ और कितनी सच्ची है।

ब्रह्म की प्राप्ति – ज्ञान और अज्ञान से परे 

ज्ञान और अज्ञान दोनों से ऊपर उठना आवश्यक है। जब तक भेदभाव की बुद्धि बनी है, ब्रह्म की प्राप्ति नहीं हो सकती।"

 श्री श्री माँ आनंदमयी

ईश्वर की प्राप्ति तभी होती है जब मन के सारे द्वंद्व — सही-गलत, अच्छा-बुरा, मेरा-तेरा — सब मिट जाते हैं। ज्ञान भी एक सीमा तक सहायक है; परंतु अंततः हमें ज्ञान और अज्ञान दोनों से पार जाना होता है। ब्रह्म तो वह अवस्था है जहाँ "मैं" और "तू" का भेद मिट जाता है।

ईश्वर की लीला — एक विराट खेल 

"सब कुछ ईश्वर का ही खेल है। वही स्वयं 'सभी' बन जाता है और अपने ही साथ खेल खेल रहा है।"

— श्री श्री माँ आनंदमयी

इस सम्पूर्ण सृष्टि को यदि हम ईश्वर की लीला मान लें, तो हमारे दुख, संघर्ष, प्रश्न — सबका भार हल्का हो जाता है। हम देख पाते हैं कि यह जीवन, इसकी घटनाएं, रिश्ते — सब किसी महान योजना के अंग हैं। तब हमारे भीतर श्रद्धा जन्म लेती है, और विश्वास बनता है कि हम अकेले नहीं — वही परमात्मा हमें थामे हुए है।

उपसंहार 

धर्म कोई बाहरी नियम नहीं, बल्कि एक अंतःप्रेरणा है।

ज्ञान कोई अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि एक साधन है उस चुप, अखंड ब्रह्म की ओर।

और यह समस्त सृष्टि — एक दिव्य खेल है, जिसमें खिलाड़ी और खेल, दोनों स्वयं ईश्वर ही है।


लेखक एवं संकलनकर्ता 

डॉ राधेश्याम गुप्ता 

21 जुलाई 2025



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