श्लोक (५६)
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ (५६)
भावार्थ: दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसका मन विचलित नहीं होता है, सुखों की प्राप्ति की इच्छा नहीं रखता है, जो आसक्ति, भय तथा क्रोध से मुक्त हैं, ऐसा स्थिर मन वाला मुनि कहा जाता है।
व्याख्या:
यह श्लोक भगवान श्रीकृष्ण द्वारा भगवद गीता में वर्णित "स्थितप्रज्ञ" (स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति) के लक्षणों का वर्णन करता है।
* "दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः" - इसका अर्थ है कि जब दुःख आते हैं, तो जिसका मन घबराता नहीं है, विचलित नहीं होता है। एक स्थितप्रज्ञ व्यक्ति दुःख को जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा मानता है और उनसे प्रभावित होकर अपनी मानसिक शांति नहीं खोता। वह जानता है कि दुःख भी क्षणभंगुर होते हैं।
* "सुखेषु विगतस्पृहः" - इसका मतलब है कि सुखों की प्राप्ति होने पर भी जिसकी कोई विशेष लालसा या इच्छा नहीं होती। वह सुखों में लिप्त नहीं होता और न ही उन्हें पाने के लिए आतुर होता है। वह जानता है कि सुख भी अस्थायी होते हैं और उनमें अत्यधिक लिप्तता अंततः दुःख का कारण बन सकती है।
* "वीतरागभयक्रोधः" - यह सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है।
* वीतराग: 'राग' का अर्थ है आसक्ति या लगाव। वीतराग का मतलब है जो आसक्ति से मुक्त हो। वह किसी भी वस्तु, व्यक्ति या स्थिति से अत्यधिक जुड़ाव नहीं रखता, क्योंकि आसक्ति ही भय और क्रोध का मूल कारण है।
* भय: वह किसी भी चीज़ से भयभीत नहीं होता। भय अज्ञान और असुरक्षा की भावना से उत्पन्न होता है। जब व्यक्ति सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है, तो उसे कुछ भी खोने का डर नहीं रहता।
* क्रोध: वह क्रोध से मुक्त होता है। क्रोध आसक्ति और अपेक्षाओं के पूरे न होने पर उत्पन्न होता है। जब कोई व्यक्ति किसी चीज़ से लगाव नहीं रखता और उसकी कोई अपेक्षा नहीं होती, तो क्रोध की कोई जगह नहीं रहती।
* "स्थितधीर्मुनिरुच्यते" - ऐसा व्यक्ति जिसकी बुद्धि (धी) स्थिर (स्थित) हो, उसे 'मुनि' कहा जाता है। 'मुनि' वह होता है जो मननशील हो, आत्म-ज्ञानी हो और जिसकी चेतना परम सत्य में स्थित हो। ऐसे व्यक्ति की बुद्धि अटल होती है और वह बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती।
संक्षेप में, यह श्लोक बताता है कि वास्तविक ज्ञानी या मुनि वह है जो सुख-दुःख, भय-क्रोध, और आसक्ति जैसी द्वंद्वों से ऊपर उठकर अपनी बुद्धि को स्थिर रखता है।
श्लोक (५७)
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ (५७)
भावार्थ: इस संसार में जो मनुष्य न तो शुभ की प्राप्ति से हर्षित होता है और न अशुभ के प्राप्त होने पर द्वेष करता है, ऐसी बुद्धि वाला पूर्ण ज्ञान में स्थिर होता है। (५७)
व्याख्या:
यह श्लोक भी स्थितप्रज्ञ के लक्षणों को ही आगे बढ़ाता है, विशेष रूप से उसकी समता की भावना पर जोर देता है।
* "यः सर्वत्रानभिस्नेहः" - 'सर्वत्र' का अर्थ है सभी जगह या सभी परिस्थितियों में। 'अनभिस्नेह' का अर्थ है स्नेह या आसक्ति रहित। इसका मतलब है कि व्यक्ति सभी स्थानों, वस्तुओं और व्यक्तियों के प्रति अनावश्यक लगाव या आसक्ति नहीं रखता। वह तटस्थ भाव रखता है, जबकि प्रेम और करुणा उसके भीतर होती है, वह आसक्ति के बंधन में नहीं बँधता।
* "तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्" - 'तत्तत्' यानी वह-वह, 'प्राप्य' यानी प्राप्त करके, 'शुभाशुभम्' यानी शुभ और अशुभ। इसका अर्थ है कि जब उसे शुभ (पसंद की चीज़ें, सफलता, प्रशंसा) या अशुभ (नापसंद की चीज़ें, असफलता, निंदा) प्राप्त होता है। जीवन में सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान, जय-पराजय आते रहते हैं।
* "नाभिनंदति न द्वेष्टि" - यह इस श्लोक का मुख्य बिंदु है।
* नाभिनंदति: वह शुभ की प्राप्ति पर अत्यधिक प्रसन्न या हर्षित नहीं होता है। वह उसमें लिप्त होकर अपना संतुलन नहीं खोता।
* न द्वेष्टि: वह अशुभ की प्राप्ति पर घृणा, द्वेष या निराशा नहीं करता है। वह उसे स्वीकार करता है और उससे प्रभावित होकर अपनी मानसिक शांति भंग नहीं करता।
* "तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता" - ऐसे व्यक्ति की 'प्रज्ञा' (गहरी बुद्धि, अंतर्दृष्टि) 'प्रतिष्ठिता' (स्थिर या स्थापित) होती है। इसका अर्थ है कि उसकी बुद्धि पूर्ण ज्ञान में दृढ़ता से स्थापित हो चुकी होती है। वह संसार के द्वंद्वों से ऊपर उठकर एक समान और संतुलित अवस्था में रहता है। उसकी समझ गहरी होती है और वह जानता है कि सभी परिस्थितियां अस्थायी होती हैं और आत्मा इन सबसे परे है।
संक्षेप में, यह श्लोक हमें सिखाता है कि एक सच्चा ज्ञानी वह है जो जीवन के उतार-चढ़ाव में भी अपनी मानसिक समता और संतुलन बनाए रखता है। वह न तो सफलता से फूला समाता है और न ही असफलता से टूटता है। उसकी बुद्धि सत्य में दृढ़ता से स्थापित होती है।
लेखक एवं संकलनकर्ता
डॉ राधेश्याम गुप्ता
22 जुलाई 2025
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