Wednesday, 30 July 2025

श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 2 श्लोक 70 एवं 71

 अध्याय 2 श्लोक 70:


आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमाप: प्रविशन्ति यद्वत्।

तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।70।।


भावार्थ:

जिस प्रकार चारों ओर से नदियाँ निरंतर समुद्र में गिरती रहती हैं, परंतु समुद्र अपनी मर्यादा, शांति और स्थिरता को नहीं खोता — उसी प्रकार सभी इच्छाएँ एक स्थिर और आत्मसंयमी व्यक्ति के भीतर प्रवेश कर जाती हैं, लेकिन वह विकारों से प्रभावित नहीं होता। वही व्यक्ति सच्ची शांति को प्राप्त करता है, न कि वह जो इच्छाओं की पूर्ति में लगा रहता है।--

व्याख्या:


इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने स्थिर-बुद्धि और आत्मसंयम को परम शांति की कुंजी बताया है।


जैसे समुद्र विशाल होते हुए भी नदियों से विचलित नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी व्यक्ति भी इच्छाओं के आने-जाने से प्रभावित नहीं होता।


वह व्यक्ति इच्छाओं के वशीभूत नहीं होता, बल्कि उन्हें केवल देखता है, जानता है, और छोड़ देता है।


यह शांति इंद्रिय-सुखों की प्राप्ति से नहीं, बल्कि वैराग्य और स्व-स्थिति में स्थित रहने से प्राप्त होती है।

इसका गूढ़ संदेश है कि बाहरी परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, अंदर से शांत, संतुलित और अनासक्त रहकर ही हम सच्ची शांति पा सकते हैं।

श्लोक 71:

विहाय कामान्य: सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृह:।

निर्ममो निरहङ्कार: स शान्तिमधिगच्छति।।71।।


भावार्थ:


जो मनुष्य सभी भौतिक इच्छाओं का त्याग कर चुका है, जो स्पृहारहित (लोभ और लालच रहित), ममता रहित (किसी वस्तु से मोह नहीं) और अहंकार रहित है — वही मनुष्य सच्ची और शाश्वत परम शांति को प्राप्त कर सकता है।---

व्याख्या:


यह श्लोक गहराई से त्याग, वैराग्य और आत्मबोध की ओर इंगित करता है।


"विहाय कामान्": इच्छाओं का त्याग करना आसान नहीं, पर यह जरूरी है।


"निःस्पृह": बाहरी चीज़ों के लिए लालच या इच्छा का न होना।


"निर्मम": 'यह मेरा है' की भावना का नाश — मोह का अभाव।


"निरहंकार": 'मैं' की भावना का विसर्जन — आत्मज्ञान की अवस्था।



 यह व्यक्ति अब स्वयं को ही शुद्ध आत्मा मानता है, न शरीर, न संबंध, न नाम — इसलिए वह किसी बात से न दुखी होता है, न उत्साहित।

संक्षेप में संदेश:


इन दोनों श्लोकों का सार यह है कि —

वह व्यक्ति ही परम शांति को प्राप्त करता है, जो इच्छाओं से मुक्त, अनासक्त, अहंकारहीन और आत्मस्वरूप में स्थित है।


श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि केवल इच्छाओं की पूर्ति करने वाला व्यक्ति कभी शांति नहीं पा सकता, परंतु इच्छाओं का त्याग करने वाला व्यक्ति शाश्वत शांति को प्राप्त कर सकता है।

लेखक एवं संकलन कर्ता 

डा राधेश्याम गुप्ता 

30 जुलाई 2025

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