Thursday, 31 July 2025

श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 2 श्लोक संख्या 3 व 4

 अध्याय 2

 श्लोक 3

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।

अनुवाद:

हे पार्थ! नपुंसकता को मत अपनाओ, यह तुममें शोभा नहीं देता। इस तुच्छ हृदय की दुर्बलता को त्यागकर, हे शत्रुहंता, उठो और युद्ध के लिए तैयार हो।

भावार्थ:

 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उनके मन की कमजोरी और युद्ध से विमुख होने की भावना को त्यागने का उपदेश दे रहे हैं। अर्जुन युद्ध के मैदान में अपने प्रियजनों के खिलाफ लड़ने की अनिच्छा और दुख के कारण विचलित हो गए हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह कमजोरी एक योद्धा और क्षत्रिय के लिए अनुचित है। वे अर्जुन को प्रेरित करते हैं कि वे इस क्षणिक दुर्बलता को छोड़कर अपने कर्तव्य का पालन करने के लिए दृढ़ संकल्प लें।

व्याख्या:

क्लैब्यं मा स्म गमः: श्रीकृष्ण अर्जुन को "नपुंसकता" या कायरता की ओर न जाने की सलाह दे रहे हैं। यहाँ "क्लैब्यं" का अर्थ है मन की वह कमजोरी जो कर्तव्य पालन में बाधा डालती है।

नैतत्त्वय्युपपद्यते: श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह कमजोरी अर्जुन जैसे महान योद्धा के लिए शोभा नहीं देती। अर्जुन एक पराक्रमी क्षत्रिय हैं, और उनकी यह स्थिति उनके व्यक्तित्व और धर्म के विपरीत है।

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं: यहाँ "क्षुद्र" (तुच्छ) और "हृदयदौर्बल्यं" (हृदय की कमजोरी) से तात्पर्य उस अस्थायी मानसिक कमजोरी से है जो अर्जुन को शोक और मोह के कारण घेर रही है।

त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप: श्रीकृष्ण अर्जुन को इस कमजोरी को त्यागकर उठ खड़े होने और अपने शत्रुओं का दमन करने के लिए प्रेरित करते हैं। "परन्तप" शब्द अर्जुन की वीरता और शत्रु-नाशक स्वभाव को दर्शाता है।

आधुनिक संदर्भ में: यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन में जब हम कठिन परिस्थितियों या भावनात्मक उलझनों का सामना करते हैं, तब हमें कमजोरी को त्यागकर अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए दृढ़ता दिखानी चाहिए। यह आत्मबल और संकल्प की महत्ता को रेखांकित करता है।

श्लोक 4

अर्जुन उवाच:

कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।

इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूज्यार्हाव् अरिसूदन।।

अनुवाद:

अर्जुन बोले: हे मधुसूदन! मैं युद्ध में भीष्म और द्रोण जैसे पूजनीय व्यक्तियों पर बाणों से कैसे प्रहार करूँ, जो मेरे लिए सम्मान के योग्य हैं, हे अरिसूदन?

भावार्थ: 

इस श्लोक में अर्जुन अपनी मनोदशा को व्यक्त करते हैं। वे श्रीकृष्ण से कहते हैं कि वे युद्ध में अपने दादा भीष्म और गुरु द्रोण जैसे आदरणीय व्यक्तियों के खिलाफ हथियार कैसे उठा सकते हैं। अर्जुन का मन उनके प्रति श्रद्धा और स्नेह के कारण विचलित है, और वे इस नैतिक दुविधा में फँसे हैं कि क्या कर्तव्य पालन के लिए उन्हें अपने पूजनीय लोगों के खिलाफ लड़ना उचित होगा।

व्याख्या:

कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये: अर्जुन अपनी दुविधा व्यक्त करते हैं कि वे युद्ध के मैदान में पितामह भीष्म के खिलाफ कैसे लड़ सकते हैं। भीष्म उनके दादा और कुरु वंश के सबसे सम्मानित व्यक्ति हैं।

द्रोणं च मधुसूदन: अर्जुन अपने गुरु द्रोणाचार्य का भी उल्लेख करते हैं, जिन्होंने उन्हें धनुर्विद्या सिखाई। "मधुसूदन" श्रीकृष्ण का एक नाम है, जो उनके दैत्य मधु के वध करने के कारण है। यहाँ अर्जुन श्रीकृष्ण को इस नाम से संबोधित करते हैं, जो उनकी निकटता और विश्वास को दर्शाता है।

इषुभिः प्रतियोत्स्यामि: अर्जुन पूछते हैं कि वे बाणों (हथियारों) से इन पूजनीय व्यक्तियों का सामना कैसे कर सकते हैं।

पूज्यार्हाव् अरिसूदन: अर्जुन कहते हैं कि भीष्म और द्रोण पूजनीय हैं, और उनके खिलाफ युद्ध करना उनके लिए असंभव-सा लगता है। "अरिसूदन" श्रीकृष्ण का एक और नाम है, जिसका अर्थ है शत्रुहंता।

आधुनिक संदर्भ में: यह श्लोक मानवीय भावनाओं और नैतिक दुविधाओं को दर्शाता है। अर्जुन की तरह, हम भी जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियों का सामना करते हैं जहाँ कर्तव्य और व्यक्तिगत भावनाएँ परस्पर विरोधी होती हैं। यह श्लोक हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि कर्तव्य पालन में व्यक्तिगत संबंधों और भावनाओं का क्या स्थान है।

सारांश:

श्लोक 3 में श्रीकृष्ण अर्जुन को उनकी कमजोरी और कायरता को त्यागकर कर्तव्य पालन के लिए प्रेरित करते हैं। यह श्लोक आत्मबल और दृढ़ता का संदेश देता है।

श्लोक 4 में अर्जुन अपनी नैतिक दुविधा को व्यक्त करते हैं, जो उनके मन में पूजनीय व्यक्तियों के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य के बीच टकराव को दर्शाता है।

लेखक एवं संकलन कर्ता 

डॉ राधेश्याम गुप्ता 

31 जुलाई 2025 

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