Monday, 23 June 2025

महर्षि रमण के उपदेश

 

We are reading the printed characters on paper but ignore the plain  background . 

Similarly you are taken up by the manifestations of mind and let go the background who's fault is it ? 


क्या हम सिर्फ अक्षरों को देखते हैं, पृष्ठभूमि को नहीं?

कभी सोचा है, जब हम कोई किताब पढ़ते हैं या अपने फ़ोन पर कुछ देखते हैं, तो हमारी नज़र सिर्फ शब्दों और तस्वीरों पर क्यों टिकी रहती है? हम उस सफेद या हल्के रंग की पृष्ठभूमि पर ध्यान क्यों नहीं देते, जिस पर वे छपे होते हैं? वो पृष्ठभूमि तो हमेशा मौजूद रहती है, है ना?

यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे हम अपने जीवन में जीते हैं।

दिमाग की चाल और हमारा ध्यान

हमारा मन अक्सर बहुत कुछ बनाता रहता है – सोच, भावनाएं, कल्पनाएं, यादें। कभी हम खुश होते हैं, कभी दुखी, कभी गुस्से में, कभी शांत। ये सब मन की "अभिव्यक्तियाँ" हैं, जैसे कागज़ पर छपे अक्षर। हम इन अक्षरों में इतना खो जाते हैं कि उनके पीछे जो "पृष्ठभूमि" है, उसे भूल जाते हैं।

ये पृष्ठभूमि क्या है? यह हमारे अस्तित्व का वो शांत, स्थिर और अपरिवर्तनीय हिस्सा है। यह वो है जो हमेशा हमारे साथ रहता है, चाहे मन कितनी भी हलचल मचाए। जैसे कागज़ की पृष्ठभूमि अक्षरों के आने-जाने से नहीं बदलती, वैसे ही हमारी सच्ची प्रकृति मन की लहरों से प्रभावित नहीं होती।

कुछ आसान उदाहरण:

 * मोबाइल फ़ोन: सोचिए, आपका फ़ोन एक स्क्रीन है। उस पर आप तरह-तरह के ऐप्स खोलते हैं, वीडियो देखते हैं, मैसेज भेजते हैं। ये सब ऐप्स और वीडियो मन की अभिव्यक्तियाँ हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये सब किस पर चल रहा है? उस खाली, स्थिर स्क्रीन पर, जो हमेशा मौजूद रहती है, भले ही उस पर कुछ भी दिख रहा हो या नहीं। हम ऐप्स में इतना डूब जाते हैं कि स्क्रीन को भूल जाते हैं।

 * आकाश और बादल: आकाश को देखिए। उसमें कभी सफेद बादल तैरते हैं, कभी काले, कभी तूफानी। ये बादल मन की बदलती हुई अवस्थाएँ हैं। लेकिन बादलों के पीछे हमेशा विशाल, नीला और शांत आकाश मौजूद रहता है। बादल आते हैं और चले जाते हैं, पर आकाश हमेशा वैसा ही रहता है। क्या हम बादलों में इतना उलझ जाते हैं कि आकाश को भूल जाते हैं?

तो गलती किसकी है?

जब हम सिर्फ मन की अभिव्यक्तियों में उलझे रहते हैं और अपनी शांत, स्थिर पृष्ठभूमि को भूल जाते हैं, तो इसमें किसी की गलती नहीं है। यह बस हमारी आदत बन जाती है। हम बाहर की चीजों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, और अपने अंदर की शांति को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

यह हमें याद दिलाता है कि जीवन की भागदौड़ में, हमारे दिमाग में चल रहे शोर के बावजूद, एक स्थिर और शांत जगह हमेशा हमारे अंदर मौजूद है। हमें बस थोड़ा रुककर, उस पृष्ठभूमि को महसूस करना सीखना होगा।

डॉ राधेश्याम गुप्ता 

23 जून 2025


तो अगली बार जब आप कुछ पढ़ें या किसी सोच में खो जाएं, तो एक पल रुककर अपने अंदर की उस शांत पृष्ठभूमि को भी याद करने की कोशिश कीजिएगा। शायद आपको एक नई शांति का अनुभव हो।


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